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हाथ पीले होने की घड़ी आई, पूरी रकम हाथ नहीं आई

Wed, 23 Nov 2016 01:06 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
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बैंकों में जुट रही रुपये निकालने के लिए भारी भीड़। - फोटो : Rajesh Kumar
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गोला बाजार में करेंसी की क्राइसिस ने एक युवती को सात फेरे से पहले लगातार दो दिन बैंक के चक्कर लगाने को मजबूर किया बल्कि इस मशक्कत के बाद भी खाते में जमा पूरी रकम हासिल कर पाने में कामयाबी नहीं मिली। हालात से समझौता कर परिवार ने रिश्तेदारों से एडवांस लेकर डॉली की डोली विदा करने के अरमान पूरे किए।
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यह कहानी है खैरपार गांव के सुरेंद्र की। बेटी डॉली की मंगलवार को शादी के इंतजामों को देख डॉली सहित उन्होंने जहां मंगलवार दोपहर तक का वक्त मदरिया के यूको बैंक में गुजारा, वहीं सोमवार का तकरीबन पूरा दिन। श्रमिक की तरह मेहनत से जीवकोपार्जन करने वाले इस परिवार के सदस्यों ने बताया कि पाई-पाई कर जोड़ी रकम से जब डॉली के खाते में 50 हजार रुपये जुट गए तो ही शादी की तारीख तय की। निराशा इस बात की है कि बेटी के ब्याह के वक्त बेटी के एकाउंट में जमा 50 हजार दो दिन की कोशिश के बाद भी नहीं निकल सके।

बड़ी मिन्नत और बड़े इंतजार के बाद बैंक स्टाफ ने सोमवार को 12 हजार रुपये दिए तो बाकी रकम डॉली की मां के खाते में ट्रांसफर करने के बाद 20 हजार और दिए। इसके बाद अपनों के सहयोग से जरूरी खर्चों की भरपाई की और मंगलवार रात सिकरीगंज क्षेत्र के असौजी गांव के दीपक के साथ सात फेरे पूरे कराके डॉली की डोली विदा की। कभी खुद पे कभी हालात पर रोना आया ‘कभी खुद पे..कभी हालात पर रोना आया’, कहने को तो ये पुराने दौर के फिल्मी गाने की लाइनभर है लेकिन मंगलवार को भी लंबी लाइनों के बीच गुजरी बैंकिंग की रिर्पोर्टिंग के दौरान वरिष्ठ प्रबंधक स्तर के एक बैंक अफसर से जब परिदृश्य से जुड़े सवाल किए तो जवाबों के जरिए बाहर आई उनके ‘मन की बात’ का लब्बोलुआब कुछ ऐसा ही था।
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आपबीती की शक्ल में अनुभव साझा किए तो कभी निराशा सामने आ रही थी तो कभी भविष्य की चिंता। सपाट अल्फाज में बोले, मैं ही नहीं हर बैंक कर्मचारी की दिनचर्या में बिना डिपॉजिट तनाव का ब्याज बढ़ रहा है। दुखद है कि खराब रुटीन के बीच न घर वालों को समय दे पा रहे हैं और बैंक को ज्यादा समय देकर भी ग्राहकों को संतुष्ट नहीं कर पा रहे। रिजर्व बैंक जरूरत के मुताबिक करेंसी नहीं दे पा रही और लोग समझते हैं कि बैंक वाले मनमानी कर रहे हैं। हर दिन चिंता का बड़ा बोझ लेकर ब्रांच में दाखिल होते हैं। मन में एक ही सवाल होता है, आज कितना और कैसे बांटेंगे, लोगों को कैसे समझाएंगे। करेंसी फ्लो की कमी का तर्क लोगों को संतुष्ट नहीं कर पाता। बहस और गुस्सा देखकर लगता है कि लोग बैंकों का भरोसा खो बैठे हैं।

सच बताएं तो चेस्ट में करेंसी की हालत पतली होने का अंदाजा पहले से होने पर घबराते हुए सीट की ओर बढ़ते हैं। बड़ी तकलीफ ये भी है कि तकलीफें बांट भी नहीं सकते। हर साथी इसी माहौल से गुजर रहा है तो अफसर और पब्लिक सच को सच मानने को तैयार नहीं हैं। आज के जमीनी हालात बार-बार ऊपर वाले को याद करने पर मजबूर करते हैं, वही कर रहे हैं।
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