जिले के सभी बूचड़खाने ही नहीं तमाम चौराहों, गलियों और गांवों के बाजारों में धड़ल्ले से चल रही मीट, मुर्गे की दुकानें भी अवैध हैं। किसी के पास भी न तो खाद्य सुरक्षा विभाग से जारी लाइसेंस है और न ही रजिस्ट्रेशन। पुलिस विभाग द्वारा कुछ इलाकों में कार्रवाई छोड़ दें तो अभी इन अवैध बूचड़खानों और मीट की दुकानों के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई। सिर्फ शासन स्तर पर मुख्यमंत्री की सख्ती की ही वजह से जिले के तमाम बूचड़खाने और मीट की दुकानें बंद हो गई हैं।
मीट कारोबारियों की मानें तो उन्हें हर दिन करोड़ों का नुकसान हो रहा है। सिर्फ शहर में ही मीट की जहां आठ सौ से अधिक दुकानें हैं वहीं चिकन की तीन हजार से अधिक दुकानें संचालित होती हैं। कई मांसाहारी होटल और रेस्त्रां का कारोबार भी मंदा पड़ गया है। वहीं खाद्य सुरक्षा विभाग के अभिहीत अधिकारी अजीत कुमार के मुताबिक बूचड़खानों और मीट की दुकानों के लिए लाइसेंस जारी करने की अलग-अलग शर्तें हैं। वर्तमान में न ही किसी के पास लाइसेंस है और न ही कोई इन शर्तों को पूरा कर रहा है। उन्होंने कहा कि जैसे ही शासन से इस संबंध में कोई आदेश जारी होता है, अभियान चलाकर कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी। बताया कि बिना लाइसेंस के शास्त्री चौक, घोष कंपनी, असुरन आदि स्थानों पर संचालित हो रहीं चिकन की 13 दुकानों के खिलाफ विभाग ने मुकदमा दर्ज कराया है।
बूचड़खानों के लिए लाइसेंस की शर्तें
- बूचड़खाना चार खंडों में बंटा हो- प्रवेश, जानवरों के विश्राम, पशुवध और निकासी प्वाइंट
- वहां से निकलने वाले अपशिष्ट के प्रबंधन की व्यवस्था हो
- शहर में नगर निगम, टाउन एरिया में नगर पंचायत और ग्रामीण इलाकों में तहसील से एनओसी ली हो
- हर बूचड़खाने में वैटनरी डॉक्टर हो, उनके द्वारा जांच के बाद मीट पर स्टांप लगाया जाए
- वेटनरी डॉक्टर द्वारा पशु के कटने और उसके बाद मीट की हुई जांच का प्रमाण पत्र भी जारी किया जाएगा
- बूचड़खाने धार्मिक स्थल, शाकाहारी प्लाजा आदि के बगल में नहीं होंगे
मीट की दुकानों के लिए लाइसेंस की शर्तें
- दुकान पर पशु व पक्षी का वध नहीं होगा
- बेचने वाले को कोई संक्रामक रोग न हो
- बूचड़खाने से लिया गया वैद्य मीट ही बेच सकेंगे
- अवशेष अपशिष्ट के लिए वेस्ट बिन लगाना होगा
- स्थानीय निकाय से एनओसी लेना होगा