बड़े नोटों की पाबंदी और निजी अस्पताल के निर्दयी रवैये ने एक शख्स की जान ले ली। रुक-रुक कर मांगी गई इलाज की रकम और छोटे नोटों के इंतजाम में घरवाले बैंक का चक्कर काटते रहे, जबकि पूरी फीस के इंतजार में डॉक्टर बेहतर इलाज से हाथ खींचे रहे। हालत बिगड़ने से मरीज की मौत हो गई तो शव को लावारिस हॉल में मेडिकल कॉलेज परिसर में डलवा दिया। रकम लेकर पहुंचे घर वालों को बेहतर इलाज के लिए मेडिकल कॉलेज शिफ्ट कराने की जानकारी दी गई। वहां मरीज न मिलने के बाद की खोजबीन में घर वालों को स्पष्ट हुआ कि शव लावारिस मिला था और मोर्चरी में है।
घटना के केंद्र में हैं कुशीनगर में हनुमानगंज क्षेत्र के रामपुर जंगल निवासी 40 वर्षीय सुब्बा। घर वालों के कहना है कि छह नवंबर को चारपाई से गिरने के कारण सिर में गहरी चोट लगी थी। बेहतर इलाज की उम्मीद में गोलघर के बद्रिका अस्पताल लाए थे। भर्ती करने से पहले अस्पताल स्टाफ ने डेढ़ लाख मांगे। छोटे नोटों की किल्लत से जूझते परिवार ने खेत गिरवीं रखकर 10 नवंबर तक यह रकम जुटाई तो इलाज की शुरुआत हुई। इलाज के दौरान 14 नवंबर को तीन लाख रुपये और जमा करने के लिए कहा गया। पुराने प्रतिबंधित नोट न लेने की शर्त भी लगा दी। नतीजे में फिर सुब्बा की पत्नी और बेटा तीमारदारी छोड़ रकम का बंदोबस्त करने के लिए बैंक और रिश्तेदारों के बीच दौड़ते रहे। इधर-उधर के सहयोग और गहने बेच कर जुटी रकम लेकर 22 नवंबर को अस्पताल पहुंचे तो सुब्बा पूर्व निर्धारित बेड पर नहीं मिले। पूछने पर शुरुआत में स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। काफी पूछने पर बेहतर इलाज के लिए मेडिकल कॉलेज भेजने की जानकारी दी।
आनन-फानन परिवार के लोग मेडिकल कॉलेज पहुंचे। कई घंटे की कोशिश के बाद भी वहां के वार्डों और रिकार्ड में अपने मरीज की जानकारी न मिलने पर बुधवार को पुलिस चौकी पहुंचे। पूरा वाकया सुनने और उम्र व हुलिया जानने के बाद पुलिस ने 21 नवंबर की शाम 5.45 बजे मेडिकल कॉलेज में लावारिस हाल मिले शव की जानकारी दी। संदेह के बीच मोर्चरी ले जाकर शव से सामना कराया तो सुब्बा को मृत हालत में देख पत्नी और बेटा टूट गए। पीड़ित परिवार ने अस्पताल पर मनमाफिक रकम के लिए इलाज रोकने और मौत पर शव को लावारिस की तरह फिंकवाने का आरोप लगाते हुए पुलिस से कार्रवाई की मांग की है।
चाहकर भी मदद नहीं कर पा रहे थे रिश्तेदार
सुब्बा की पत्नी तारा का कहना है कि अस्पताल से बड़ी रकम की मांग पूरी करने के लिए कई अपने मदद के लिए आगे आए लेकिन छोटे नोटों की कमी से चाहकर भी मदद नहीं कर पाए। जमीन गिरवी रखकर और गहने बेचकर जैसे-तैसे खर्च का बंदोबस्त किया लेकिन पति की जान नहीं बच सकी। अस्पताल की शर्तें जानलेवा बन गईं।
पुलिस सख्त कार्रवाई करे, न्याय दिलाए
सुब्बा के बेटे मुन्ना का कहना है कि बद्रिका अस्पताल से दो दफा मांगी गई मोटी रकम जुटाने की भागदौड़ में मैं और मां पिता के साथ नहीं रह सके। अस्पताल ने उनके अकेले होने का फायदा उठाया और जान जाती देख खामोशी से लावारिस की तरह मेडिकल कॉलेज में फिंकवा दिया। पुलिस सख्ती करे, तभी हमें न्याय मिल सकता है।