मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में खून बेचने की कोशिश में एक युवक को पकड़ लिया गया। पूछताछ में उसने दो हजार रुपये देकर एक यूनिट खून देने पर खुद की रजामंदी स्वीकार की। हालांकि ब्लड बैंक स्टाफ की सतर्कता से खून बेचने की कोशिश कामयाब नहीं हुई लेकिन पुलिस की ढिलाई से पकड़ में आया युवक भाग गया।
एकाएक खून की जरूरत कुशीनगर जिले के पटहेरवा थाना क्षेत्र के समवदा गांव निवासी अनिल की पत्नी सरोज को महसूस हुई, जिन्हें 11 जुलाई को खाना बनाते समय झुलसने के कारण मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। बर्न वार्ड बेड नंबर 54 पर भर्ती सरोज के लिए खून की जरूरत देख मेडिकल टीम ने ब्लड बैंक में ओ पॉजिटिव रक्त मौजूद होने की जानकारी देते हुए इसे लेने से पहले बदले में डोनर का बंदोबस्त करने के लिए कहा।
बताते हैं कि घर वाले रक्त और डोनर की तलाश के दौरान एक दलाल सरीखे से शख्स से टकरा गए, जिसने रक्तदान के एवज में दो हजार रुपये की शर्त रखते हुए समस्तीपुर (बिहार) के मूल निवासी और शहर के कौवाबाग इलाके में रहने वाले सूरज को डोनर के तौर पर पेश कर दिया। मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में रक्तदान से पहले की काउंसलिंग में डॉक्टर के सवालों के दौरान उसकी रक्त बेचने की कोशिश पकड़ में आ गई। मेडिकल कॉलेज प्रशासन को जानकारी देने के बाद सूरज को पुलिस के हवाले कर दिया गया, हालांकि चौकी में अपनी बातों से पुलिस को बरगला कर वह भाग गया।
दो माह पहले रक्तदान का हवाला देकर फंसा
मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में डोनर बनकर आए खून बेचने वाले शख्स से पूर्व के रक्तदान का अनुभव पूछा गया तो उसने दो माह पहले रक्तदान करने की जानकारी दी। काउंसलिंग कर रहे डॉक्टर ने एक शख्स के दो रक्तदान के बीच न्यूनतम तीन माह का अंतर बताते हुए प्रतिप्रश्न किए तो उसके मुंह से पैसे की जरूरत की बात निकल गई। इसके बाद सख्ती से हुई पूछताछ में उसने और रक्त लेने के इच्छुक मरीज के तीमारदारों ने दो हजार रुपये की डील की बात स्वीकार कर ली।
‘बेटी की पढ़ाई के लिए बेच रहा था खून’
बिहार के रहने वाले जिस युवक को मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में खून बेचने की कोशिश के दौरान पकड़ा गया, उसके पुलिस को चकमा देकर भाग जाने से उसकी भूमिका के साथ-साथ उसके बयानों को भी संदेह से देखा जाने लगा लेकिन गिरफ्त में आने से लेकर चौकी से फरार होने तक के बीच में उसके बयानों में रक्त दाता की जगह रक्त विक्रेता बनने की जो मजबूरी बताई गई, वो सभी को चौंका गई। खुद को समस्तीपुर का सूरज बताने वाले युवक ने कहा, बेटी को इंगलिश मीडियम स्कूल में पढ़ाने की चाहत ने उसे ’रक्त विक्रेता’ बना दिया।
मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में सामान्य डोनर के तौर पर पहुंचे सूरज के हुलिया से उसके श्रमिक वर्ग से जुड़े होने का भान हुआ। पूछताछ में उसने बताया कि जीवन यापन के लिए पत्नी बच्चों के साथ गोरखपुर आ गया और कौवाबाग में किराये के मकान में रहकर एक नर्सिंग होम में सफाई कर्मचारी की नौकरी कर ली। इस बीच बेटी ज्योति को स्कूल भेजकर पढ़ाई करने का समय आ गया। अच्छी तालीम दिलाने की ललक में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में उसके दाखिले की कोशिश की लेकिन हर जगह बताया गया एडमीशन का खर्च उसकी मासिक आमदनी के औसत से कई गुना ज्यादा था। बताया कि बच्ची के दाखिले के लिए मुनासिब लगे एक इंगलिश मीडियम स्कूल से एडमीशन के लिए चार हजार रुपये का खर्च बताया गया है। इसी रकम को जुटाने के लिए वह खुद के रक्त की कीमत लगवा रहा है।
सूरज के इस बयान ने मेडिकल कॉलेज की टीम ही नहीं उस वक्त नजदीक जुटे दूसरे रोगियों के तीमारदारों को भी चौंका दिया। महंगे इलाज के साथ महंगी शिक्षा और निजीकरण से बढ़ती कीमत को लेकर सवाल उठने लगे। अलबत्ता सूरज के पुलिस की पकड़ से भाग जाने की जानकारी पर उसके व्यक्तित्व और उसके बयान को संदेह से देखा जाने लगा। हर कोई बोला, पता नहीं उसकी बातों में कितना सच था।
ऐसे पहुंचें स्वैच्छिक रक्तदाताओं तक
खून की जरूरत होने और डोनर न होने की दशा में ऑनलाइन डोनर की तलाश की जा सकती है। इसके लिए जिला स्तर की वेबसाइट द्दद्मश्च.ठ्ठद्बष्.द्बठ्ठ पर जाकर डोनर खोज सकते है। इसके अलावा प्रदेश स्तर पर भी एक वेबसाइट ह्यड्ढड्ढह्लठ्ठद्बष्.द्बठ्ठ है। इन दोनों ही वेबसाइट पर डोनर के नाम के साथ ही नंबर है जो स्वैच्छिक रक्तदाता है और शहर में रहने पर खून दे सकते हैं।