गोरखपुर। वक्त के साथ सियासत के मायने भी बदलने लगे। पहले मुद्दों पर राजनीति होती थी, अब उनका कोई महत्व नहीं रह गया है। इस चुनाव में राजनीतिक पार्टियों के क्या मुद्दे हैं, किसे लेकर वह वोट मांग रही हैं, आम लोगों को पता नहीं है। लोगों को यदि मालूम है तो यह कि एक तरफ नरेंद्र मोदी को लाने का प्रयास हो रहा है, तो दूसरी तरफ सभी पार्टियां उन्हें रोकने की तरकीब खोज रही हैं। सभी दलों के निशाने पर सिर्फ एक नेता हैं, मोदी। यहां बुनयादी मुद्दे दरकिनार हो गए हैं।
इससे पूर्व के कई लोकसभा चुनाव में भी जरूरी मुद्दे हाशिए पर ही थे पर चुनाव की शुरुआत में किसी मुद्दे से होती थी। 1984 में इंदिरागांधी की हत्या बाद जब लोकसभा चुनाव हुआ तो सबसे प्रमुख मुद्दा आतंकवाद था। कांग्रेस के नेता आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने के लिए जनता से सरकार बनाने के लिए वोट मांग रहे थे। वहीं विपक्षी दल आतंकवाद के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रहे थे। उनका आरोप था कि जिस भिंडरावाले के समर्थकों ने इंदिरागांधी की हत्या की, उसे कांग्रेस ने ही पैदा किया था। चुनाव में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी और राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने। उनके कार्यकाल में बोफोर्स तोप की खरीद में घोटाले की बात सामने आई। वीपी सिंह जैसे नेताओं ने कांग्रेस के खिलाफ बगावत का विगुल बजा दिया। देश में नई पार्टी जनता दल का उदय हुआ। 1989 के चुनाव में बोफोर्स घोटाले को मुद्दा बनाकर जनता दल के नेताओं ने चुनाव लड़ा और कांग्रेस की सरकार चली गई।
भाजपा के सहयोग से वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने थे। तभी भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या में राममंदिर निर्माण को लेकर रथयात्रा निकाली। बिहार में लालू यादव ने उनकी गिरफ्तारी करवाई तो भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। 1991 में आम चुनाव हुआ तो राममंदिर मुख्य मुद्दा बन गया। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी। एनडीए की सहयोगी पार्टी के समर्थन वापस लेने के कारण एक वोट से बाजपेयी की सरकार गिर गई। 1999 में लोकसभा का चुनाव हुआ और भाजपा नेताओं ने उसे ही मुद्दा बनाकर देश भर में प्रचार किया। दोबारा एनडीए की सरकार केंद्र में बनी। 2004 के चुनाव में भाजपा नेताओं ने शाइनिंग इंडिया का नारा देकर चुनाव लड़ा, पर वह नारा काम नहीं आया। इन सभी चुनाव में मुद्दे गौड़ होते चले गए।
2014 के 16वें लोकसभा चुनाव की शुरूआत विकास की राह पर चलने, घोटालों और घपलों को समाप्त करने के संकल्प से हुई। पर धीरे-धीरे ये मुद्दे गायब हो गए। क्षेत्रीय दल हों या राष्ट्रीय, जिले का नेता हो या देश प्रदेश का, हर किसी के निशाने पर मोदी हैं। या तो लोग उन्हें सत्ता में लाने की बात करते हैँ या उन्हें सत्ता में आने से रोकने की। यह हाल पूरे पूर्वांचल का है। लोगों की जुबान पर अगर कोई है तो वह हैं मोदी। फर्क सिर्फ यह है कि नाम किस तरह लिया जाता है समर्थक या विरोधी के रूप में।