गोरखपुर। साहित्य के क्षेत्र में सर्वाधिक शोध गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस पर हुआ है। हिंदी भाषा में अब भी सबसे ज्यादा किताबें तुलसीदास पर ही लिखी गई हैं। विदेशों में रामचरितमानस के अनुवाद इस बात के साक्षी हैं कि यह धर्मग्रंथ सभी के लिये उत्सुकता का विषय आज भी है। ये बातें साहित्य अकादमी के अध्यक्ष प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कही। मंगलवार को तुलसीदास इंटरमीडिएट कॉलेज में आयोजित तुलसी जयंती के मौके पर कैंपस में तुलसी की प्रतिमा का अनावरण और ‘तुलसीदास कल, आज और कल’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में प्रो. तिवारी मुख्य वक्ता के रूप में उनकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाल रहे थे।
उन्होंने कहा कि भारत के घर-घर में तुलसीदास रचित ग्रंथ अथवा उनके अंश देखने-सुनने को मिलते हैं। विदेशों में मारीशस, सूरीनाम, त्रिनीदाद, फिजी आदि देशों में भी घरों के आगे बने तुलसी चौड़ा पर उनकी दोहावली लिखी रहती हैं। प्रो. तिवारी ने कहा कि सन् 1532 से 1623 का काल अकबर व जहांगीर का था। लेकिन उसी काल में तुलसीदास बिना किसी हिंसा के अपनी लड़ाई जीती। वह लड़ाई थी बिना जबरदस्ती के लोगों के दिल में शांति का जगह बनाने की। अकबर के इतिहासकार अबुल फजल व अब्दुल कादिब बदाइनी ने अपने किताबों में तुलसीदास का कोई जिक्र नहीं किया था।
अंग्रेजी लेखक विंसेंट स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘अकबर : द ग्रेट वॉरियर’ के अंतिम पन्ने पर जिक्र किया है कि अकबर से भी एक महान योद्धा तुलसीदास उस वक्त थे जो उनके समानांतर सत्ता चला रहे थे। बिना लड़ाई के विजय हासिल कर लोगों के दिलों में जगह बना ली थी। रूस व चीन के साहित्यकारों की चर्चा करते हुए कहा कि उनकी इन देशों के दौरे में रामचरितमानस के अनुवाद लेखक से मुलाकात हुई है और वे तुलसीदास के कसीदे पढ़ रह थे। ईसाई देशों में रामचरितमानस को हिन्दुओं की बाइबिल कहा जाता है। इससे पहले अखिल भारतीय विद्वत परिषद के राष्ट्रीय महासचिव कामेश्वर उपाध्याय, गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अनंत मिश्र, प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. माता प्रसाद त्रिपाठी, राजनीतिशास्त्र विभाग के आचार्य प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी, विनय शंकर तिवारी आदि ने भी अपने विचारों को रखा। आगत अतिथियों को खलीलाबाद के सांसद कुशल तिवारी, उप्र. विधान परिषद के सभापति गणेश शंकर पांडेय आदि ने स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वैद्य आत्माराम दूबे ने किया जबकि आभार कॉलेज के प्रबंधक हरिशंकर तिवारी ने किया।