गोरखपुर। उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एचके सेमा ने कहा कि कोई भी व्यक्ति अपने को किसी जाति का कहे, हरेक की जाति भारतीय है। चिकित्सा, शिक्षा और न्याय आम जनता का मौलिक अधिकार है। इस दिशा में अधिकारियों को संवेदनशीलता से कार्य करने चाहिए। आम आदमी के हितों को ध्यान में रखते हुए आयोग सादे कागज पर भी आवेदन स्वीकार करता है। उसका उद्देश्य पीड़ित को न्याय और दोषी को सजा दिलाना है।
जस्टिस सेमा जीडीए सभागार में उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग की तरफ से ‘मानवाधिकार के प्रति जागरूकता’ विषय पर आयोजित कार्यशाला में विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जिलाधिकारी जिले का अभिभावक होता है। उन्हें मानवाधिकार से संबंधित समस्याओं का स्थायी समाधान करना चाहिए, जिससे भविष्य में कोई विवाद न हो। पुलिस की भूमिका ऐसी होनी चाहिए कि जनता या पीड़ित उनको अपना मित्र समझे। उन्होंने कहा कि वर्ष 2011-12 में 38823 शिकायतें आयोग को प्राप्त हुई थीं, जिसमें से 11999 मामलों का निस्तारण कर दिया गया।
मानवाधिकार आयोग के सदस्य जस्टिस विष्णु सहाय ने कहा कि अभियुक्त जब पुलिस की संरक्षण में जाता है उस समय उसके शरीर पर किसी प्रकार के चोट के निशान नहीं होते हैं। बाद में चोट के निशान मिलते हैं। इससे जाहिर होता है कि पुलिसिया कस्टडी में मानवाधिकार हनन होता है। उन्हाेंने चिकित्साधिकारियों को संवेदनशीलता से कार्य करने की सलाह देते हुए जेल में कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार करने की बात कही।
मानवाधिकार आयोग के अपर पुलिस महानिदेशक वीके गुप्त ने कहा कि मानवाधिकार के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए बहुत से प्रयास किए गए हैं। प्रदेश में इस मामले में जागरूकता बढ़ी भी है, पर उतनी जागरूकता नहीं आ पाई है, जितनी आनी चाहिए।
कार्यक्रम में मंडलायुक्त के. रविंद्र नायक, आईजी ब्रजभूषण, डीआईजी मुथा अशोक जैन, डीएम रविकुमार एनजी, एसएसपी आशुतोष कुमार, डीएम कुशीनगर आर सैंफिल सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी और स्वयंसेवी संस्थाओं के लोग मौजूद थे।