गोरखपुर।
गोरखपुर की दस्तकारी( शिल्पकला) के नेपाली कायल हैं। नेपाल के लोगों के सिर की शोभा बढ़ाने वाली टोपी यहीं के बुनकरों की कारीगरी का नायाब नमूना है। लेकिन जीएसटी ने इस पूरी व्यवस्था की कमर तोड़ कर रख दी है। बाजार से धागा गायब है। जिसकी वजह से बुनकर न तो माल उठा पा रहे हैं और न ही इसका थान बना पा रहे हैं। पहले से ही सरकारी उदासीनता का शिकार इस व्यापार की जीएसटी ने कमर तोड़ दी। गोरखपुर के बुनकर कपड़ा बुनने के बाद उसे नेपाल के भैरहवां कृष्णानगर व उसके आसपास के क्षेत्रों में ले जाकर बेचते हैं। लेकिन जीएसटी लागू होने के बाद नेपाल में कपड़ा पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पा रहा है।
15 साल से नेपाली राजशाही टोपी के कपड़े की बुनाई हथकरघा से करने वाले वजीराबाद गोरखनाथ निवासी अलाउद्दीन ने बताया कि पहले धागे पर टैक्स लगता था और थान टैक्स फ्री होता था। इसकी वजह से उन्हें बस नेपाल बार्डर पर कुछ भंसार भुगतान करना पड़ता था। जीएसटी के बाद थान और धागा दोनो टैक्स के दायरे में आ गया है। बाजार में माल नहीं होने की वजह से बुनाई का काम लगभग ठप पड़ा है। जिस वजह से पहले की तुलना में कपड़ों की सप्लाई न के बराबर है। पहले नोटबंदी और अब जीएसटी ने व्यापार को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है।
खास तरीके से बनता है नेपाली टोपी का कपड़ा
अलाउद्दीन के अनुसार, नेपाली टोपी में झंडीनुमा डिजाइन होती है। इस डिजाइन को बनाने के लिए सबसे पहले ग्राफ तैयार किया जाता है। फिर दफ्ती पर खाका तैयार किया जाता है। पत्ते पर बनी डिजाइन बनारस में काटी जाती है। पत्ते को सिल कर जकाट तैयार किया जाता है। जकाट को पावरलूम पर लगाकर नेपाली टोपी के कपड़े की बुनाई की जाती है।
गणेश मान ने की थी नेपाली टोपी के निर्माण की शुरूआत
नेपाली टोपी का निर्माण सबसे पहले गणेश मान महर्जन ने नेपाल के पाल्पा जिले में किया था। पहले इसे ढाका के कपड़े से बनाया जाता है। इसलिए इसे ढाका टोपी भी कहते हैं। इस प्रकार की टोपियां अन्य देशों जैसे ऑफगानिस्तान व इंडोनेशिया के लोग भी पहनते भी हैं। यही नहीं इसी कपड़े से नेपाल की प्रसिद्ध चोली बनाई जाती है। इसे ढाका-को-चोलो कहते हैं।