बडहलगंज (गोरखपुर)। वाकया 2009 का है। सरयू की मझधार में फंसी पांच जिंदगियों को बचाकर करन सुर्खियों में आया था। उसके अदम्य साहस को सलाम करते हुए 2010 के गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उसे संजय चोपड़ा वीरता पुरस्कार से नवाजा भी। तब करन और उसके परिवारवालों की निगाहों में उम्मीदों के दीपक चमके थे, लेकिन बहादुरी के इस किस्से पर वक्त का ऐसा पर्दा पड़ा कि करन और उसके परिवार की उम्मीदें ध्वस्त हो गईं। हालात ये हैं कि आज यह राष्ट्रीय वीर देश की राजधानी में मजदूरी कर रहा है। करन का यह हाल ‘वीरता सम्मान’ पर ही नहीं सिस्टम पर भी कई सवालिए निशान खड़े कर रहा है।
करन तब 13 बरस का था, जब गोला इलाके की महिला अपने बच्चों के साथ पुल से सरयू में कूद गई। वहां कई मूकदर्शक थे, बस करन को छोड़कर। भीड़ घटना देखकर हो-हल्ला करने लगी, मगर करन अदम्य साहस दिखाते हुए मझधार तक पहुंचा। महिला और उसके चार बच्चों की जिंदगी उसने बचा ली। इस शौर्य पर जब वह राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित हुआ तो करन के कल्याण के लिए घोषणाओं की झड़ी लग गई। गोरखपुर के विद्या भारती स्कूल सहित कई शिक्षण संस्थान करन की पढ़ाई का जिम्मा लेने आगे आए। करन के पिता रामदेव ने बताया कि विद्या भारती स्कूल में तीन माह की पढ़ाई के बाद उनसे डेढ़ लाख रुपये मांगे गए। आर्थिक स्थिति ठीक न होने से करन की पढ़ाई छुड़ानी पड़ी। वक्त के साथ मुफलिसी चुनौती बनी तो करन मछली बेचने लगा। इससे भी गुजर मुश्किल होने लगा तो दिल्ली जाकर दिहाड़ी करने लगा। पिता रामदेव के अनुसार प्रधानमंत्री से पुरस्कृत होने का कोई लाभ करन को नहीं मिला।
सांस्कृतिक मंत्री की घोषणा भी नहीं हुई पूरी
मुक्तिपथ पर 2009 में आयोजित सरयू महोत्सव में भी करन को वीरता पुरस्कार मिला। तब मंच पर मौजूद तत्कालीन सांस्कृतिक मंत्री सुभाष पांडेय ने सरकार की ओर से उसे एक लाख रुपये देने की घोषणा की। रामदेव के मुताबिक यह घोषणा आज तक पूरी नहीं हो सकी।