देवोत्थान एकादशी पर लोगों ने व्रत रखकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना की। रात में महिलाओं ने घरों से प्रतीकात्मक तौर पर दरिद्र भगाकर पारंपरिक रस्म निभाई।
देवोत्थान एकादशी का हिंदू धर्म में बहुत महत्व है। देवोत्थान एकादशी से मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं, जो मलमास शुरू होने तक चलते हैं। इस बार भद्रा और अन्य ग्रहों की स्थिति के चलते ऐसा नहीं हो रहा। हालांकि, इससे देवोत्थान एकादशी पर पूजा-पाठ और दान-पुण्य की परंपरा पर कोई फर्क नहीं पड़ा। लोगों ने सुबह स्नान के बाद भगवान विष्णु का पूजन किया। देवोत्थान एकादशी व्रत अन्य उपवास से कई गुना पुण्यकारी माना गया है। इसलिए काफी संख्या में लोगों ने व्रत रखा एवं पूजा अर्चना की।
शहर के विष्णु मंदिर पर पूरे दिन श्रद्धालु दर्शन पूजन के लिए आते रहे। दिन में जहां मंदिरों एवं घरों में पूजन का क्रम चला, वहीं लोगों ने गन्ना चूसा, सिंघाड़ा, मूंगफली खाई। इस दिन चावल नहीं खाया जाता है। इसलिए कई घरों में चावल नहीं पका। बाजार में सिंघाड़ा, मूंगफली और गन्ने की दुकानें सजी रहीं। आधी रात के बाद महिलाओं ने गन्ने से प्रतीकात्मक तौर पर दरिद्र भगाया।