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इतिहास ने दी राममंदिर की गवाही, अब मामला समाज के हाथ

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गोरखपुर। अयोध्या में राममंदिर के मसले पर कोर्ट के आदेश पर पुरातत्व विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई में किसी धार्मिक इमारत के अवेशष मिलने की बात बताई है। ऐसे में इतिहास ने इस बात की गवाही दे दी है, अब मामला समाज के हाथ में है। आपसी तालमेल से दोनों वर्गों के लोग इस पर फैसला लें या खुद कोर्ट इस पर निर्णय ले।
ये कहना है प्रख्यात फिल्मकार, लेखक और इतिहासकार डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी का। गोरखपुर यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने प्रेसवार्ता में बताया कि आज कल के धार्मिक टीवी सीरियलों में इतिहास कम और मनोरंजन ज्यादा परोसा जाता है। ऐसे में लोग उसे ही सही मानने लगते हैं। सीरियलों से इतिहास की उम्मीद बेमानी सी अब लगती है। ये चिंताजनक है, एक इतिहासकार वर्षों के अध्ययन और खोज के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। उसके हर पहलु पर तर्क रखता है। ऐसा नहीं हैं कि इतिहासकारों के निष्कर्ष पर विवाद नहीं होता, मगर इसे बस एक अलग दृष्टिकोण से देखना चाहिए। रम्या रामायणी कथा कार्यक्रम बारे में बताया कि जब हम एक कहानी दूसरे को सुनाते हैं, तो कहानी में रोचकता बढ़ाने के लिए उसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। इससे कहानी में रंग तो आ जाता है, मगर उसका मूल खो जाता है। देश में कहीं ना कहीं रामकथा चल रही है। दर्शकों ने इसे शिक्षा का माध्यम न मान, मनोरंजन का साधन मान लिया है। रामकथा का मूल वाल्मीकि रामायण ही है।
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महज कागजों में ही काम करती है सीबीएफसी
सेट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) के सदस्य डॉ. द्विवेदी बोर्ड की कार्यप्रणाली से भी नाखुश नजर आए। उन्होंने बताया कि बोर्ड की बैठक कागजों में ही होती है। वहीं मानकों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है, इससे कई बार फिल्मों के सर्टिफिकेशन को लेकर बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं। उन्होंने बताया कि नियम सभी के लिए बराबर है। इसे बराबरी की नजर से देखना चाहिए।
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