प्रभु चित्र में नहीं चरित्र में बसते हैं
- शताब्दीपुरम में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का पांचवां दिन
- भगवान श्री कृष्ण का मनाया गया जन्मोत्सव
गोरखपुर। संसार में श्रेष्ठ गुरु की आवश्यकता सभी को होती है। गुरु ही हमारे जीवन को अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की तरफ ले जाते हैं। इस कलयुग में अज्ञान से ज्ञान की ओर जाने के लिए प्रभु नाम सबसे बड़ा साधन है। शताब्दीपुरम में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के पांचवे दिन बुधवार को व्यास पीठ से आचार्य सतीश शरण पांडेय ने ये बातें कहीं।
उन्होंने बताया कि भगवान श्री कृष्ण धर्म की रक्षा के लिए, भक्तों की सहायता के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। जब कंस का अत्याचार काफी बढ़ गया तो तब धर्म की रक्षा के लिए श्री कृष्ण देवकी के गर्भ से प्रकट हुए। प्रभु का लालन-पालन गोकुल में नंद बाबा के घर हुआ। ग्वाल बालों की प्रेम भक्ति इतनी सुंदर थी कि जीवन में श्री कृष्ण की प्राप्ति हो गई।
उन्होंने कहा कि हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि हमारे अंदर इतना प्रेम हो, हमारा भी चरित्र इतना सुंदर हो कि हम पर भी प्रभु की कृपा हो जाये। प्रभु चित्र में नहीं चरित्र में बसते हैं। चित्र की पूजा नही चरित्र की पूजा होती है। भक्तों का चरित्र इतना सुंदर था तभी श्री कृष्ण उन्हें प्राप्त हुए। इस दौरान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव भी मनाया गया। इस दौरान सुरेंद्र श्रीवास्तव, उर्मिला श्रीवास्तव, मनीष, सुनील, विजय, अमन, नीरू, नीलम, चित्रलेखा समेत दर्जनों श्रद्धालु मौजूद रहे।