गोरखपुर। शायर और कवि को सियासत से दूर रहना चाहिए। अगर हम किसी के तरफदार हो जाएंगे तो रचनाओं में इंसाफ नहीं कर पाएंगे। यहीं से बेईमानी का जन्म होता है। शायरी में सिर्फ सच बोलना होता है और सियासत में झूठ जरूरी है। सियासत मुल्क को खराब दिशा में ले जा रही है। हालात ऐसे हैं कि हिंदुस्तान में कई हिंदुस्तान बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। मेरी अंतिम इच्छा है कि बचपन वाला हिंदुस्तान को देख कर ही दुनिया छोड़ूं।
यह बातें प्रख्यात शायर मुनव्वर राना ने पत्रकारों से बातचीत में कहीं। वे शहर के बरगदवां में एक निजी कार्यक्रम में आए हुए थे। आज के युवा शायर अवार्ड को पहचान की सीढ़ी मानते हैं, क्या यह सही है? इस मुद्दे पर मुनव्वर गंभीर हो जाते हैं। कहते हैं, पहचान के लिए अवार्ड जरूरी नहीं, जरूरत अगर है तो अच्छी रचनाओं की। मीर, गालिब और तुलसी को कौन सा अवार्ड मिला था। कौन है जो उन्हें नहीं जानता। मेरा मानना है कि अवार्ड भी तरक्की में बाधा हैं। युवा अपनी सोच बदलें। मैंने, 2015 में साहित्य अकादमी का अवार्ड वापस कर दिया। कसम खाई कि जीवन में कोई सरकारी अवार्ड नहीं लूंगा क्योंकि सरकारी अवार्ड कलम की कीमत लगाते हैं। यही कसम बेटे को भी दी है। शायरी में तुकबंदी पर उठ रहे सवाल को मुनव्वर खारिज करते हैं। कहते हैं, तुकबंदी बुरी नहीं है। सीखने की प्रक्रिया है। कोई पैदा होते ही बड़ा शायर नहीं बन जाता। अंत में इतना ही कहना चाहता हूं- हम अभी हैं तो हुनर हमसे हमारे ले लो, वरना हम भी एक दिन दीवार में लग जाएंगे।
दरबार में शायरी पहुंची तो महत्व कम हो गया
साधु, संत, मौलवी जब दरबारों में हाजिरी लगाने लगे तो उनका महत्व घट गया। ठीक उसी तरह जब शायरी राजा के दरबारों में पहुंचने लगी तो उसका भी महत्व कम होने लगा। अब तो कवि सम्मेलन और मुशायरा भी कारोबार हो गए हैं। मुझे तो आज का कवि सम्मेलन मुजरे के समान लगता है।