‘अमर उजाला’ ने विमला देवी, निर्भय साहनी, शिवम साहनी और कुंता देवी को उनकी बहादुरी के लिए सम्मानित किया।
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मन में संवेदना हो तो कुछ कर गुजरने का साहस भी जागता है। तभी तो किसी की जान बचाने के लिए कोई अपनी जान जोखिम में डाल पाता है। 12 साल के निर्भय साहनी हों या 10 साल का उनका दोस्त शिवम साहनी में भले अभी यह समझ न हो पर उन्होंने इसे जीकर दिखा दिया। नदी में जान देने के लिए कूद पड़ी सुरक्षित महिला को उन्होंने बचा लिया। कुंता देवी और विमला देवी साधारण गृहणी हैं। सामाजिक सरोकारों की परिभाषा नहीं समझतीं। हां, जान देने रेल पटरी पर लेटे बुजुर्ग को अनहोनी से पहले ही बचा जरूर लाईं। रविवार को जब शहर में अलग-अलग तैयारियां चल रही थीं, ‘अमर उजाला’ ने इन ‘नायकों’ का भावपूर्ण अभिनंदन कर नए साल का जश्न मनाया।
अमर उजाला कार्यालय में हुआ समारोह सादा लेकिन भाव व गरिमा से भरा था। साहस की मिसाल कायम करने वाले शिवम साहनी, निर्भय साहनी, कुंता देवी व विमला देवी का बुके देकर गर्मजोशी से स्वागत किया गया। इन सभी ने उन घटनाओं के बारे बताया। इतना बड़ा काम करने के बाद भी उनके चेहरे पर कोई अहंकार न था। सहज भाव से उन्होंने तफ्सील से जानकारी दी। इन लोगों के इस साहसिक काम की सभी उपस्थितजनों ने सराहना की। सबने कहा कि यह औरों के लिए नजीर भी है। एक ऐसा जज्बा जो अनमोल है। ‘अमर उजाला’ की ओर से चारो ‘नायकों’ को नववर्ष की शुभकामनाएं दी गईं और उपहारस्वरूप नकद धनराशि व अंगवस्त्र भेंट किए गए। इन सभी ने इस सम्मान के लिए अमर उजाला के प्रति आभार जताया।
जोखिम बड़े थे पर बचा ही ली जान
वह 21 दिसंबर की शाम थी। गृहक्लेश से तंग 33 वर्षीय महिला ने खुदकुशी के इरादे से बड़हलगंज-दोहरीघाट पुल से सरयू नदी में कूद पड़ी। किनारे बैठे पांचवीं में पढ़ने वाले निर्भय साहनी और शिवम साहनी ने देखा तो बिना देर किए नाव लेकर उस ओर चले। महिला डूबने ही वाली थी कि दोनों ने पानी में छलांग लगाकर बचा लिया। डूब जाने की जिद पर अड़ी महिला को विरोध के बावजूद उन्होंने जैसे-तैसे नाव पर चढ़ाया। कद-काठी से अपनी उम्र से भी कम दिखने वाले शिवम ने बताया कि बचाने से बड़ी मशक्कत उन्हें नाव पर लादने में हुई। फिर किनारे ले आए।
22 दिसंबर को कुछ ऐसी ही इबारत पीपीगंज रेलवे स्टेशन पर गांव की दो गृहणियों ने लिखी। पिपराइच के पचाड़े गांव की दलित बस्ती निवासी अक्षयबर भारती की पत्नी कुंता देवी और उमा भारती की पत्नी विमला ट्रेन के इंतजार में बैठी थीं। तभी ट्रेन की सीटी सुनाई दी। उधर निगाह घुमाई तो एक बुजुर्ग ट्रैक पर लेटे नजर आए। दोनों बिना देर किए वहां पहुंचीं। बुजुर्ग को हटने को कहा तो वह जान देने पर तुले रहे। तेज रफ्तार ट्रेन पास आती जा रही थी। कुंता और विमला ने हिम्मत दिखाई। बुजुर्ग को ट्रैक नहीं, बल्कि मौत के मुंह से खींच लिया। वे उन्हें तब तक पकड़े रहीं जब तक ट्रेन गुजर न गई।
सम्मान के साक्षी
शिवम साहनी (पुत्र सुरेंद्र साहनी), उनकी मां फुलझड़ी देवी, निर्भय साहनी (पुत्र जयराम साहनी), उनकी मां सुभावती व भाई जोगेंदर साहनी को ‘अमर उजाला’ कार्यालय तक मुक्तिपथ के व्यवस्थापक/ कोषाध्यक्ष महेश उमर और मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव प्रहलाद राय लेकर आए। कुंता और विमला देवी अपने गांव से महेंद्र तिवारी के साथ आईं। अमर उजाला परिवार के सदस्यों के साथ ये लोग भी इस अभिनंदन के साक्षी बने।