गोरखपुर। खिचड़ी मेले की जमीन वह जगह है जहां सैकड़ों साल पहले लोककल्याण और आध्यात्मिक-सामाजिक पुनर्जागरण का योगदीप जला था। धर्म के नाम पर आडंबर-पाखंड और भ्रष्ट आचरण की आंधियों के बीच महायोगी गोरखनाथ का जलाया वह दीप समाज को राह दिखाने वाला अखंड प्रकाश स्तंभ बन गया। सेवा भी साधना ही है, इस भाव के साथ नाथपंथ के शीर्ष केंद्र गोरक्षपीठ और गोरखनाथ मंदिर की महंत परंपरा ने इस प्रकाश को अपने समय के समाज के अंधेरे कोनों तक पहुंचाया। बीसवीं सदी में पीठ ने शिक्षा एवं स्वास्थ्य को सबसे बड़ी मानव-सेवा मानते हुए इस क्षेत्र में व्यापक अध्याय जोड़े।
महायोगी गोरखनाथ ने मानव-जीवन के परम-लक्ष्य, मोक्ष के लिए नाथपंथ के रूप में योग आधारित तन-मन की जो साधनापद्धति विकसित की, उसमें लोककल्याण प्रबल पक्ष है। नाथपंथ ने सुसंस्कृत व स्वस्थ समाज की रचना को ही लोक-कल्याण का स्थायी मार्ग माना। समरस-संवेदनशील समाज लोककल्याण को समर्पित और सेवाभावी होगा। सेवाभावी समाज ही दु:ख से मुक्त अध्यात्मिक प्रवृत्तियों वाला होगा। इसी सामाजिक परिवेश में नाथपंथी योगसाधना अपने चरम-लक्ष्य तक पहुंचेगी। साफ है, नाथपंथ ने सेवासाधना के बल पर लोककल्याण और योगसाधना के द्वारा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त किया। गोरक्षपीठ और गोरखनाथ मंदिर की महंत परंपरा सेवा और योगसाधना का समन्वित नाथपंथी रूप है।
शिक्षा क्षेत्र में विशेष
महंत दिग्विजयनाथ ने शिक्षा-स्वास्थ्य के मद्देनजर वर्ष 1932 में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की नींव रखी। परिषद ने 1948 तक प्राथमिक से लेकर उच्चशिक्षा देने वाली कई संस्थाएं खड़ी कर दीं। गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना इसी सेवासाधना के संकल्प का परिणाम था। इस क्षेत्र में प्रथम महिला महाविद्यालय (महाराणा प्रताप महिला महाविद्यालय, जो विश्वविद्यालय की स्थापना का हिस्सा बन गया) तकनीकी शिक्षा के लिए प्रथम पालीटेक्निक (महाराणा प्रताप पालीटेक्निक, 1956), प्रथम आयुर्वेदिक कालेज (दिग्विजयनाथ आयुर्वेदिक कालेज,1971) का श्रेय भी गोरक्षपीठ को ही है। वर्तमान में गोरखनाथ मंदिर द्वारा 44 संस्थान संचालित हैं। इनमें हर स्तर की शिक्षा से लेकर कृषि विज्ञान केंद्र, गो-सेवा और दरिद्र नारायण सेवा जैसी संस्थाएं भी हैं।
चिकित्सा पर भी नजर
गोरक्षपीठ के सेवा दायरे में मानव ही नहीं पशु-पक्षी भी हैं। मंदिर की गोशाला गो-सेवा का विशिष्ट माडल है। दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तायुक्त शिक्षा और गांव के गरीब-असहायों तक नि:शुल्क चिकित्सा पहुंचाने में भी पीठ जुटा हुआ है। प्रतिवर्ष लगभग 5000 रोगियों का नि:शुल्क उपचार, 2000 हजार गरीबों का नि:शुल्क आंख का आपरेशन तथा गरीब-असहायों की आर्थिक सहायता गोरक्षपीठ की सेवासाधना का हिस्सा है। यही नहीं, करीब 750 छात्र-छात्राओं व खिलाड़ियों को छात्रवृत्ति देने के अलावा पीठ 500 विद्यार्थियों के रहने-खाने, वस्त्र व पढ़ाई की पूरी व्यवस्था भी करता है।
समाज से समरस मंदिर
गोरखनाथ मंदिर में महायोगी गोरखनाथ को भोग लगाने के बाद भंडारा खुल जाता है। रोज लगभग 500 दीन-दुखी, गरीब प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण करते हैं। त्योहारों पर मंदिर व उसके महंतों का सामाजिक सहभाग भी अनूठा है। विजयादशमी पर श्रीराम का राजतिलक-शोभायात्रा, महाशिवरात्रि आयोजन, कृष्ण-जन्मोत्सव, शहीदों के नाम दीपोत्सव, होली पर नृसिंह पूजा और फिर जुलूस में शामिल होकर जनता के साथ रंग खेलना इस सहभाग के उदाहरण हैं।
(लेखक एमपीपीजी कॉलेज, जंगल धूसड़ के प्राचार्य हैं)