गोरखपुर। यूनिवर्सिटी के संवाद भवन में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन रम्या रामायणी कथा के दूसरे दिन रविवार को विद्वानों ने विदेशी ताकतों को भारतीय इतिहास और संस्कृति पर हावी बताया। कहा कि पूर्व इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को नीचा दिखाने का प्रयास किया और इसे विकृतिकरण करने का काम किया। भारतीय पुराण अध्ययन संस्थान और भारतीय इतिहास संकलन समिति के इतिहासकारों ने कहा कि तर्क व सुबूतों के आधार पर वे आने वाली पीढ़ी को सही ज्ञान के आधार पर स्वाभिमानी बनाने के लिए प्रयासरत हैं।
गोरखपुर विश्वविद्यालय, भारतीय पुराण अध्ययन संस्थान और भारतीय इतिहास संकलन समिति की ओर से आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन विद्वानों ने कहा कि मात्र किताबों के आधार पर विद्यार्थियों को पढ़ाने के बजाए देश के गौरवपूर्ण इतिहास और सांस्कृतिक सच्चाइयों से अवगत कराने की आवश्यकता है। डॉ. बाल मुकुंद ने कहा कि रामायण और महाभारत ही एक मात्र एतिहासिक ग्रंथ है। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास को नीचा दिखाने के लिए श्रीरामचंद्र को सीता का त्याग करते बताया गया है, जबकि हकीकत में राम महिलाओं का सबसे ज्यादा सम्मान करते थे।
मुकुंद ने कहा कि किताबों में भारतीयों को पराजित दिखाया गया है। महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान, शहीद भगत सिंह आदि का जिक्र एक लाइन में निपटा दिया गया, वहीं सिकंदर, अकबर और बाबर आदि का विस्तार से वर्णन है। देश के सामने सच्चाई लाने की आवश्यकता है। इतिहास संकलन योजना 1994 से इस कार्य में जुटी है। 400 से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है और 500 से अधिक सेमिनार कराए जा चुके हैं।
राजस्थान में पाठ्यक्रम शुरू
राजस्थान में नौवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में महाराणा प्रताप, रानी पद्मिनी और पृथ्वीराज चौहान को शामिल कर विद्यार्थियों को इनके बारे में पढ़ाया जा रहा है। इसी तरह महाराष्ट्र में शिवाजी मराठा का पाठ्यक्रम भी पढ़ाया जाने लगेगा। संस्था उत्तर प्रदेश में भी इतिहास का पाठ्यक्रम बदलवाने के लिए प्रयासरत है।
- डॉ. बाल मुकुंद
समस्त भारतीयों में राम व्याप्त
श्रीराम का चरित्र एक ऐसी संजीवनी है जो निष्प्राण को भी सजीव बना सकता है। समस्त भारतीयों में श्रीराम व्याप्त हैं। इनके बिना भारतीयता की कल्पना ही नहीं की जा सकती।
- सचिन राय, शोध छात्र, गोरखपुर यूनिवर्सिटी
रामकथा से विश्व की संस्कृतियां प्रभावित
रामकथा एक ऐसी सहज और प्रभावशाली कथा है, जिसने विश्व की अनेक संस्कृतियों को प्रभावित किया है। संस्था के प्रयासों से विदेशों में भी रामायण अब लोकप्रिय होने लगी है।
- प्रो. महेश कुमार शरण, अध्यक्ष गोरक्षप्रांत
रामकथा पर हैं सैकड़ों ग्रंथ
रामायण संस्कृति काव्य है। भारतीय जीवन संस्कृति, कला, साहित्य आदि का मूल स्त्रोत है। भारतीय भाषाओं में रामकथा पर सैकड़ों ग्रंथ लिखे गए हैं। हर प्रांत के लोकगीतों, कलाओं में राम के आदर्शों रामायण के पात्रों का चित्र दिखाई देता है।
- प्रो. संतोष कुमार शुक्ल, समन्वय भारतीय पुराण अध्ययन संस्थान