गोरखपुर। शक्ति की उपासना का पर्व नवरात्र छह अप्रैल से शुरू हो रहा है। इस वर्ष चैत्र नवरात्र व्रत आठ दिनों का ही होगा। 13 अप्रैल को अष्टमी व नवमी तिथि एक ही दिन पड़ेगी।
आचार्य पंडित शरद चंद्र मिश्र ने बताया कि देव मंदिर या जिस घर में भगवती दुर्गा की पूजा करनी हो, वहां की भूमि को अच्छी तरह धोकर नवरात्र का अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति को प्रतिपदा के दिन प्रात: स्नान से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करके पूजन सामग्री लेकर आसन ग्रहण करना चाहिए। भगवती दुर्गा जी के चित्र या प्रतिमा अथवा त्रिशूल पर ही उत्तर या पूर्वाभिमुख होकर पूजन करें। एक पाटे (पटरी) पर अपने बाएं ओर आधे में सफेद वस्त्र, दाहिनी ओर आधे में लाल वस्त्र बिछाकर सफेद वस्त्र पर चावल की नौ कुड़ी नवग्रह की आकृति एवं लाल वस्त्र पर गेहूं की 16 कुड़ी षोडश मातृका का बनाएं।
एक सुपारी में धागा लपेट कर श्री गणेश जी और गाय के शुद्ध गोबर से गौरी का भी निर्माण कर लें। इसके बाद शुद्ध मिट्टी में गेहूं या जौ मिलाकर ज्वारा के लिए तैयार कर लें। यदि कलश पर स्वर्ण मूर्ति विराजमान कर भगवती दुर्गा की पूजा करनी हो तो वरूण कलश के अतिरिक्त एक कलश और स्थापित किया जाएगा। अन्यथा भित्ति पर त्रिशूलादि की पूजा करनी हो तो एक ही कलश स्थापित होगा। इस प्रकार एक या दो कलश में स्वस्तिक बनाकर उसके गले में मौली बांधकर कर तैयार करें तथा गणेश इत्यादि देवताओं के पूजन के लिए दीपक भी तैयार करें। पूजन की सामग्री एकत्रित होने के पश्चात जलपात्र में गंध, पुष्प और अक्षत डालकर आचमन करें। गणेश, गौरी, मातृका और नवग्रह का पूजन के बाद मां भगवती दुर्गा जी की पूजा और आरती करें। लाल फूल, कमल आदि माता भगवती को प्रिय हैं।
शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य राकेश पांडेय के मुताबिक इस बार कलश स्थापना के लिए चार शुभ मुहूर्त हैं। प्रात: 5:48 से 6:12 प्रथम द्विस्वभाव लग्न मीन, 9:45 से 11:59 द्वितीय द्विस्वभाव लग्न मिथुन, शाम 4:31 से 6:12 बजे तक तृतीय द्विस्वभाव लग्न कन्या के अलावा दोपहर 11:36 से 12:24 बजे तक अभिजित मुहूर्त कलश स्थापना के लिए बेहद शुभ है।