गोरखपुर।
चार वर्ष से जिले के लोगों के लिए खौफ का सबब बन रहा डेंगू का ‘डंक’ इस बार कमजोर पड़ गया है। पिछले वर्ष सैकड़ा पार कर गए मरीजों की संख्या इस बार महज चार पर सीमित है। यह संभव हो सका है बीमारी को लेकर लोगों में बढ़ी जागरूकता से।
जिले में डेंगू के आतंक पर लगाम कसने में स्वास्थ्य विभाग की कोशिशें बिना जन जागरूकता के कामयाब नहीं हो सकती थीं। इसलिए स्वास्थ्य विभाग ने बीमारी पर काबू पाने की कोशिशों में लोगों को जागरूक करने का काम प्राथमिकता पर किया। जगह-जगह होर्डिंग लगवाए, पैम्फलेट बंटवाए। पारंपरिक प्रचार माध्यमों के अलावा जनसंचार माध्यमों का भी खूब सहारा लिया गया। इसका असर अब सामने आया है। लोग मच्छरजनित बीमारियों के प्रति जागरूक हुए हैं। नतीजा यह है कि पिछले वर्ष 167 लोगों को बीमार करने वाला डेंगू का बुखार इस बार सिर्फ चार लोगाें पर ही चढ़ा।
डेंगू शॉक सिंड्रोम जानलेवा
डॉ. बीके सुमन बताते हैं कि डेंगू का शुरुआती स्तर पर ही उपचार बेहतर होता है। पहले स्तर पर इसे डेंगू बुखार कहा जाता है। इसके लक्षण सामान्य बुखार की तरह ही होते हैं। बुखार और बदन दर्द के साथ उल्टियां भी होती हैं। दूसरे स्तर को डेंगू हैमरेजेज फीवर कहते हैं। इसमें मरीज की प्लेटलेट्स कम होने लगती है। चमड़ियों पर खून के थक्के जमने लगते हैं। छींक के साथ खून आता है और आंखों से भी खून आ सकता है। यह स्थिति बिगड़कर डेंगू शॉक सिंड्रोम का रूप ले लेता है। इसमें प्लेटलेट्स घटकर 10,000 तक पहुंच जाती हैं। यह स्थिति अधिकांशत: जानलेवा साबित होती है। ऐसे में डेंगू बुखार की आशंका लगे तो नजदीकी अस्पताल जाना चाहिए। मरीज को बुखार के लिए पैरासिटामॉल का इस्तेमाल करना चाहिए और खूब पानी पीना चाहिए। मरीज को मच्छरदानी में रहना चाहिए, ताकि मच्छरों से होकर ये बीमारी दूसरों तक न पहुंचे।
चार साल से चिंता बढ़ा रहा था डेंगू
इंसेफेलाइटिस की महामारी के बीच डेंगू बुखार पिछले चार वर्षों से जिले में खौफ बढ़ा रहा था। इसकी रोकथाम के लिए इस बार अगस्त से ही स्वास्थ्य विभाग ने कोशिशें शुरू कर दी थीं। सीएमओ डॉ. रवींद्र कुमार ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग ने पुराने रिकॉर्ड के अनुसार फॉगिंग अगस्त से ही शुरू करा दी थी। जलभराव वाली जगहों पर एंटी लार्वा स्प्रे भी कराया गया। जिले भर में जन जागरूकता के लिए विभिन्न कार्यक्रम कराए गए। कई जगहों पर लार्वा की जांच की गई। जहां लार्वा मिले, उन्हें सफाई कराने के लिए नोटिस भेजा गया। विभाग के प्रयासों और लोगों की जागरूकता का नतीजा रहा कि इस बार जिले में डेंगू के सिर्फ चार मरीज आए और सिर्फ दो मरीजों की जान गई।
अब इंसेफेलाइटिस और स्वाइन फ्लू की बारी
स्वास्थ्य महकमा जन जागरूकता के दम पर डेंगू पर अंकुश लगाने में तो कामयाब हुआ लेकिन अभी इंसेफेलाइटिस और स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियां दहशत बढ़ा रही हैं। सीएमओ डॉ. रवींद्र कुमार कहते हैं कि इन बीमारियों पर भी डेंगू की तरह जन जागरूकता के जरिये काबू पाया जा सकता है। इन बीमारियों के सफाए के लिए जन जागरूकता अहम और कारगर हथियार है। बुखार होने पर लोग नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र जाएं। साथ ही अपने आसपास सफाई पर संजीदगी बरतें। जिस बुखार को आप नजरअंदाज कर रहे हैं, वह इंसेफेलाइटिस हो सकता है और जिस सर्दी-जुकाम को सामान्य मानने की गलती कर रहे हैं वो स्वाइन फ्लू होकर जानलेवा साबित हो सकता है।
25 फीसदी बढ़ा मच्छरनाशक प्रोडक्ट का कारोबार
मच्छरनाशक प्रोडक्ट के डिस्ट्रीब्यूटर अमित जगनानी ने बताया कि मच्छर मारने के लिए आने वाली ब्रांडेड लिक्विड और क्वॉयल का हर माह करीब एक करोड़ रुपये का कारोबार शहर में हो रहा है, जबकि नॉन ब्रांडेड मच्छरनाशक प्रोडक्ट का कारोबार करीब 50 लाख रुपये है। बीते साल के मुकाबले इस साल इसका मार्केट 25 फीसदी बढ़ा है।