गोरखपुर।
राष्ट्रीय पेयजल मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों के हर परिवार 40 लीटर शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने का सरकार ने लक्ष्य निर्धारित किया है, लेकिन ग्रामीण की बात तो छोड़िए शहर के भी कई इलाकों में लाखों, करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद करीब दो दशक से लोगों को अपने घरों तक पानी पहुंचने का इंतजार है। अगर इन टंकियों से समय से पानी की सप्लाई शुरू हो जाती, तो सात से आठ लाख लोगों की हैंडपंप से निर्भरता खत्म हो जाती।
गोरखपुर एवं आसपास के कई इलाके इंसेफेलाइटिस प्रभावित हैं। इसके लिए दूषित पानी को भी जिम्मेदार माना जाता है। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की ओर से कराए गए शोध में कई इलाकों के भूगर्भ जल में भी आर्सेनिक, फ्लोराइड समेत कई हानिकारक तत्व पाए गए हैं। इसके बावजूद शहर समेत कई ब्लॉकों में दो-ढाई दशक पहले बनी पानी की टंकियों से लाखों घरों में आज तक पानी नहीं पहुंच सका हैं। घरों तक पानी की पाइपलाइन नहीं बिछ पाने की वजह से ये सारी टंकियां शो-पीस बनकर रह गई हैं। इसके लिए विभाग फंड का रोना रो रहा है। वहीं दो-ढाई दशक पहले बनी पानी की इन टंकियों की मजबूती भी सवालों के घेरे में है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतने दिनों बाद इनकी गुणवत्ता में कुछ तो कमी आ ही गई होगी। जब टंकी लोड की जाएगी तब ही इसकी वास्तविक मजबूती का आंकलन संभव है।
गांव से लेकर शहर तक यही स्थिति
- शहर के राप्तीनगर विस्तार चतुर्थ में 1990 में करीब 25 लाख रुपये की लागत से पानी की टंकी बनाई गई। ट्यूबवेल भी लगा दी गई, लेकिन आज तक पानी की सप्लाई नहीं हो सकी। अगर इस ट्यूबवेल से पानी की सप्लाई हो जाती है तो मानबेला, कोइल्हवा, करीम नगर, लल्लन टोला, राप्तीनगर की कॉलोनियां के करीब 10 हजार घरों तक पानी पहुंच जाता। ऐसे में इन इलाकों के लोगों की हैंडपंप से निर्भरता खत्म हो जाती।
- मुंडेरा बाजार में करीब 15 साल पहले पानी टंकी से आज तक सप्लाई नहीं हो सकी। जगह-जगह पानी की पाइपलाइन भी टूट गई है। ऐसे में इस इलाके के लोग बाजार से पानी खरीद कर पीते हैं।
- पीपीगंज नगर पंचायत में बनी पानी की टंकी से भी आज तक लोगों को पानी नसीब नहीं सका है। दो बार रीबोर के बाद भी सप्लाई शुरू नहीं हो सकी। इसके बावजूद करीब 30 लाख रुपये बिजली का बकाया हो गया है। साथ ही आउटसोर्सिंग पर रखे कर्मचारियों को सात लाख रुपये भुगतान हो चुका है।
- बांसगांव में करीब 27 साल पहले पानी की टंकी बनाई गई थी। 2003-04 में छह महीने तक इससे सप्लाई शुरू भी कर दी गई। इसके बाद इसे नगर पंचायत को हैंडओवर कर दिया गया, तब से आपूर्ति ठप है और करोड़ों की यह टंकी और पाइपलाइन जंक खा रही है।
- जगदीशपुर में 2003 में पानी की टंकी बनकर तैयार हो गई। लोगों को शुद्ध पेयजल मिलने की आस जगी, लेकिन पाइपलाइन बिछाए जाने के बावजूद इस टंकी से पानी की सप्लाई नहीं हो सकी है।
- भटहट में 28 मिनी टैंक खराब पड़े हैं। जिन इलाकों में इंसेफेलाइटिस के मामले पाए गए थे, उन इलाकों में इन टैंक बनवाए गए थे, लेकिन इनसे पानी की सप्लाई नहीं होती है।
- जंगल सालिक राम के शताब्दी पुरम कॉलोनी में करीब तीन साल पहले 51 लाख रुपये की लागत से बनी पानी की टंकी शो-पीस बन कर रह गई है। आज तक इससे पानी की सप्लाई नहीं हो सकी।
- जंगल मातादीन में किन्नरों की बस्ती में करीब सात साल पहले बनी पानी की टंकी से आज तक सप्लाई शुरू नहीं हो सकी है। इस वजह से यहां के हजारों लोग हैंडपंप का पानी पीने को मजबूर हैं।
फंड की कमी से नहीं हो शुरू हो पा रही सप्लाई
विभिन्न ब्लॉकों के अलावा कई ग्रामीण इलाकों पानी की टंकी बनने के बावजूद उनसे सप्लाई शुरू नहीं हो सकी हैं। इस संबंध में कई बार शासन को पत्र भेजा गया है, लेकिन फंड उपलब्ध नहीं होने से इनसे सप्लाई संभव नहीं हो पा रही है। फिलहाल विभाग उन टंकियों से पानी की सप्लाई शुरू कराने पर विचार कर रहा है, जो ट्यूबवेल की खराबी की वजह से बंद हैं।
- आरपी सिन्हा, चीफ इंजीनियर, जल निगम