गोरखपुर।
कमियों को दूर न कर पाने का खामियाजा गोरखपुर को फिर भुगतना पड़ा है। केंद्र सरकार ने शुक्रवार को स्मार्ट सिटी की जो तीसरी लिस्ट जारी की है, उसमें गोरखपुर का नाम नहीं है। अलीगढ़ और झांसी सरीखे जिले स्मार्ट सिटी की लिस्ट में आ गए, जो पिछड़े माने जाते थे। इसका मतलब है कि सीएम सिटी के अफसर बदलाव को तैयार नहीं हैं। दो सालों में खामियां दूर करने और बदलाव की कोशिश तक नहीं की गई। सारी व्यवस्थाएं जस की तस हैं। स्मार्ट सिटी की रैंकिंग भी पहली की तरह अटकी है।
जून 2015 में केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी योजना शुरू की थी। गोरखपुर नगर निगम ने इस सूची में शामिल होने के लिए खूब जोर लगाया। स्मार्ट सिटी के विभिन्न मानकों के अनुसार खुद की मार्किंग की गई, लेकिन वह इन मानकों पर खरा नहीं उतर सका। दो साल बाद भी गोरखपुर की स्थिति कमोेवेश उसी तरह की है। जिन मानकों को पूरा कर हम इस सूची में शामिल हो सकते हैं, उसके लिए कवायद की रफ्तार बहुत ही धीमी है।
सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट न होने का खामियाजा
2009 में नगर निगम ने सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट का काम शुरू किया था। लेकिन आठ साल बाद भी यह कवायद शुरुआती स्तर पर ही लटकी हुई है। कंपनी आई, भाग गई तो कभी शासन स्तर पर मामला फंसा। अगर यह योजना चालू हो गई होती तो शायद नगर निगम को इस कैटेगरी में 10 अंक मिल जाते और नगर निगम की स्मार्ट सिटी में शामिल होने की संभावना बढ़ जाती।
वाटर चार्ज नहीं लागू होने का भी नुकसान
स्मार्ट सिटी की शर्तों में एक शर्त शहर के घरों में जल मूल्य (वाटर चार्ज) का भी प्रावधान है। लेकिन यहां के पार्षदों की वजह से नगर निगम बोर्ड में वाटर चार्ज को मंजूरी नहीं मिल सकी। इससे गोरखपुर नगर निगम को पांच अंक नहीं मिल सके। इसका भी नुकसान स्मार्ट सिटी की मार्किंग में झेलना पड़ा। वर्तमान में शहर में वाटर टैक्स का प्रावधान है।
आय के स्रोत विकसित नहीं कर सका निगम
स्मार्ट सिटी के चयन में नगर निगम के आय के स्रोतों का होना भी एक महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन नगर निगम ने पिछले 10 साल से आय के अपने संसाधनों को बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया। इसका परिणाम है आज नगर निगम को ठेकेदारों का बकाया चुकाने में भी दिक्कत आ रही है।
स्मार्ट सिटी का उद्देश्य स्थानीय क्षेत्र के विकास को साकार करना
स्मार्ट सिटी मिशन का उद्देश्य स्थानीय क्षेत्र के विकास को साकार कर आर्थिक विकास को बढ़ावा देना और लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाना है। क्षेत्र आधारित विकास से मलिन बस्तियों को बेहतर नियोजित शहरों में रूपांतरित करने सहित मौजूदा क्षेत्रों का फिर से संयोजन और विकास होगा। शहरी क्षेत्रों की बढ़ती आबादी को समायोजित करने के लिए शहरों के इर्द-गिर्द नए क्षेत्र विकसित किए जाएंगे। स्मार्ट सिटी के लोग शहर की संरचना और सेवाओं में सुधार के लिए तकनीक, सूचना और आंकड़ों का उपयोग कर सकेंगे। इस तरह से व्यापक विकास से जीवन की गुणवत्ता में सुधार होगा और सभी गरीब एवं उपेक्षित लोगों की आय में बढ़ोतरी होगी।
ऐसे होती है मार्किंग
इसमें मिलते हैं 10 अंक
स्वच्छ भारत मिशन के तहत निर्मित स्वच्छता शौचालयों में बढ़ोतरी, शहर स्तरीय जेएनएनयूआरएम सुधार, जेएनएनयूआरएम के अंतर्गत मार्च 2012 तक स्वीकृत परियोजनाओं की पूर्णता, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट।
इसमें मिलते हैं पांच अंक
प्रचालनीय ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणाली, मासिक ई पत्रिका, इलेक्ट्रॉनिक रूप से सक्षम परियोजना-वार म्यूनिसिपल बजट व्यय सूचना, निर्वाचित नगर निगम परिषद का संकल्प, शहर के लोगों के साथ किए विचार विमर्श, सेवा आपूर्ति में विलंब के लिए पूरक दंड लगाना, गत तीन वित्तीय वर्षों के दौरान आंतरिक रूप से सृजित राजस्व का एकत्रीकरण, वेतन का भुगतान, लेखाओं की लेखा परीक्षा, कर राजस्व शुल्क, किराया और अन्य आंतरिक राजस्व स्रोतों के अंशदान का प्रतिशत, जल आपूर्ति की स्थापना और अनुरक्षण लागत का प्रतिशत, वित्तीय वर्ष 2014-15 में कार्यों के लिए आंतरिक राजस्व स्रोतों के अंशदान का प्रतिशत।