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डीएम ने मरवा दिए तीन घोड़े
लाइलाज ग्लैंडर्स से जूझ रहे थे तीनों
सीरम की जांच में हुई थी बीमारी पुष्टि, 2017 में भी मारे गए थे तीन घोड़े
घोड़ा मालिक को मिलेगा प्रति घोड़ा 25 हजार मुआवजा
अमर उजाला ब्यूरो
कैंपियरगंज। लाइलाज ग्लैंडर्स बीमारी से जूझ रहे तीन घोड़ों को डीएम के निर्देश पर बृहस्पतिवार को पशु चिकित्सकों की टीम ने दर्द रहित इंजेक्शन देकर मौत की नींद सुला दिया। घोड़ों को आबादी से दूर दफना गया। नियमानुसार शासन की ओर से मालिक को प्रति घोड़ा 25 हजार रुपए का मुआवजा मिलेगा। इससे पहले 9 सितंबर 2017 को गगहा के करवल मझगांवां में भी ग्लैंडर्स से पीड़ित तीन घोड़ों को मारा गया था।
क्षेत्र के घीसापुर निवासी राजेश मौर्य के पास तीन पालतू घोडे़ थे। केंद्र व प्रदेश सरकार के सहयोग से क्षेत्र के घोड़ों के रक्त का नमूना जांच के लिए समय-समय पर भेजा जाता है। इसी क्रम में राजेश मौर्य के तीनों घोड़ों का सीरम सैंपल भारतीय अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार भेजा गया, जहां ग्लैंडर्स बीमारी होने की पुष्टि हुई, जो लाइलाज बीमारी है। इसकी सूचना पशु चिकित्सकों ने डीएम सहित विभाग के उच्चाधिकारियों को दी। डीएम के विजयेंद्र पांडियन ने इस मामले में आवश्यक कार्रवाई के लिए मुख्य पशु चिकित्साधिकारी को निर्देशित किया। सीवीओ द्वारा गठित पशु चिकित्सकों की टीम ने बृहस्पतिवार को कैंपियरगंज जंगल के किनारे तीनों घोड़ों को दर्द रहित इंजेक्शन देकर मारने के बाद वहीं दफन करवा दिया। टीम में उप मुख्य पशु चिकित्साधिकारी कैंपियरगंज डॉ जीके शुक्ला, पशु चिकित्साधिकारी आलमचक डॉ हरेंद्र प्रकाश चौरसिया, पशु चिकित्साधिकारी पीपीगंज डॉ सुनील कुमार सिंह, पशु चिकित्साधिकारी बलुआ डॉ उपेंद्र शर्मा एवं पशुपालन विभाग के कर्मचारी मौजूद रहे।
इनसेट
मनुष्यों में भी तेजी से फैलता है संक्रमण
उप मुख्य पशु चिकित्साधिकारी कैंपियरगंज जीके शुक्ला ने बताया कि ग्लैंडर्स बीमारी घोड़ों और खच्चरों में होती है, जो तेजी से फैलती है। यह लाइलाज बीमारी है। अगर ग्रसित घोड़ों को नहीं मारा गया तो इनके आसपास रहने वाले मनुष्य भी इसके संक्रमण की चपेट में आ सकते हैं, लिहाजा घोड़ों को मारना जरूरी होता है। उन्होंने बताया कि इस बीमारी से ग्रसित घोड़ों को 106 डिग्री तक बुखार होता है, लगातार छींक आती है साथ ही सांस लेने में भी तकलीफ होती है।
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क्या है ये बीमारी
ग्लैंडर्स बीमारी एक संक्रामक रोग है। इसके बैक्टीरिया सेल में प्रवेश कर जाते हैं। इलाज से भी यह पूरी तरह नहीं मरते हैं। ऐसे में दूसरे जानवर और इंसान भी इससे संक्रमित हो सकते हैं। यह बीमारी ऑक्सीजन के जरिए फैलती है। शरीर में गांठें पड़ जाती हैं। गांठों में संक्रमण होने के कारण घोड़ा उठ नहीं पाता और बाद में उसकी मृत्यु हो जाती है।
लक्षण
गले व पेट में गांठ पड़ जाना, जुकाम होना (लसलसा पदार्थ निकलना), श्वास नली में छाले, फेफड़े में इन्फेक्शन
बचाव के लिए क्या करें
पशु को समय पर ताजा चारा-पानी देना, ज्यादा देर तक मिट्टी-कीचड़ में न रहने दें, साफ-सफाई का ध्यान रखना,दवाओं का छिड़काव जरूर करें
इस बात का रखें ध्यान
इस बीमारी से प्रभावित पशु को मारने के बाद गड्ढे में दबा या जला देना चाहिए। गड्डा कम से कम 4 फीट गहरा होना चाहिए।