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आज सजेगा माता का आसन

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गोरखपुर।
बंगाली परिवारों में नवरात्र का उल्लास यूं तो मंगलवार से ही हो गया था, लेकिन गुरुवार को घर में मां का आसन सजाकर देवी उपासना की शुरुआत होगी। बुधवार को पूरे दिन इसकी तैयारियां चलती रहीं। महिलाएं नवरात्र के पहले दिन माता का आसन सजाकर व्रत रखेंगी। इसके बाद पूजा की विधिवत शुरुआत षष्ठमी से होगी।
माता का आसन स्थापित करने की तैयारियों में जुटीं हुमायूंपुर निवासी आराधना रॉय ने बताया कि फूल, माला और मिठाई चढ़ाकर व्रत की शुरुआत की जाती है। पहले दिन व्रत रखने के बाद फिर षष्ठमी (छठ) से व्रत रखूंगी। छठ बेटे का व्रत होता है। सप्तमी को भोग प्रसाद चढ़ाया जाएगा। इसके बाद अष्टमी को चावल से बनी चीजों का इस्तेमाल वर्जित रहता है। नवमी को भंडारा होता है तो दशमी को सिंदूरखेला का आयोजन होता है। इसके बाद माता की विदाई होती है। दीवानबाजार में टीएन चटर्जी के घर पर भी ऐसी ही तैयारियां जारी थीं। यह परिवार दीवानबाजार में 1970 से चल रही दुर्गा पूजा के केंद्र में होता है। स्थानीय लोग व्यवस्था में सहयोग करते हैं तो यह परिवार बंगाली पद्धति से पूजन निपटाने में लगा रहता है। टीएन चटर्जी ने बताया कि चार दिन घर मोहल्ले वालों के लिए खोल देते हैं। मछली से प्यार करने वाले टीएन चटर्जी नवरात्र के कुछ रोज पहले से ही इससे किनारा कर लेते हैं।
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दसवीं के प्रसाद में मछली-चावल
बंगाली समाज में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के बाद प्रसाद में मछली-चावल खाने की मान्यता है। अनुराधा रॉय बताती हैं कि बंगाल में इसे शुभ का प्रतीक माना गया है। लड़की की विदाई होती है तो भी मछली-चावल खाया जाता है।

1896 में हुई थी दुर्गा पूजा की शुरुआत
परेशनाथ चटर्जी ने बताया कि शहर में बंगाली पद्धति से ही पहली बार दुर्गा पूजा का आयोजन किया गया था। उस वक्त सिविल सर्जन रहे डॉ. योगेश्वर रॉय ने जिला अस्पताल परिसर में पूजा का आयोजन कराया था। इसके बाद 1928 में यह पूजा दुर्गाबाड़ी पहुंची। कालांतर में भगवती प्रसाद रईस ने दुर्गाबाड़ी पूजा समिति को जमीन दान दी। तबसे यहां पर हर साल बंगाली पद्धति से दुर्गा पूजा हो रही है।
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1970 से दीवान बाजार में जारी है पूजा
दीवान बाजार में बंगाली पद्धति से दुर्गापूजा की शुरुआत 1970 में हुई थी। समिति के सामान्य व्यवस्थापक जीतेंद्र अग्रवाल ‘जीतू’ ने बताया कि पूजा कराने के लिए बनारस से पंडित विश्वनाथ भट्टाचार्य को बुलाया जाता है। वहीं ढोल बजाने के लिए पश्चिम बंगाल से वादक बुलाए जाते हैं। यहां सप्तमी पर सात, अष्टमी पर आठ और नवमी पर नौ तरह का भोग प्रसाद तैयार किया जाता है।
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