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जुगाड़ पर चल रहा जिला अस्पताल

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गोरखपुर।
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एक रुपये में बेहतर इलाज का अरमान लिए जिला अस्पताल आने वाले सैकड़ों लोगों को आजकल कड़वे अनुभवों के साथ लौटना पड़ रहा है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से कई मर्जों के इलाज का अभाव है तो दवाओं की कमी भी मुकम्मल इलाज में बाधा बन रही है। जिले के अलावा नेपाल और बिहार के सटे हुए इलाकों के लोगों को भी सीएम सिटी के इस अस्पताल से बेहतर इलाज की उम्मीद रहती है लेकिन संसाधनों की कमी दवा की जगह उन्हें भी निराशा बांट रही है।

इंतजार के बाद भी नहीं करा सके जांच
बेटे का इलाज कराने जिला अस्पताल आए बांसगांव के वीरेंद्र को डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड कराने के लिए कहा। पूरे दिन इंतजार के बाद भी वह बेटे की जांच नहीं करा सके। रोजाना ऐसे कई वीरेंद्र इसी तरह का अनुभव लेकर जिला अस्पताल के अल्ट्रासाउंड सेंटर से वापस हो रहे हैं। अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट की कमी के चलते दो मशीन होने के बाद भी सिर्फ एक ही चल पा रही है। जांच ही नहीं सर्जरी का भी कुछ ऐसा ही हाल है। डॉक्टरों की भारी कमी और दवाओं की किल्लत यहां मरीजों की मुश्किलें बढ़ा रही है।
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जिला अस्पताल में 52 डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन तैनाती सिर्फ 27 की है। इनमें से एक लंबे समय से छुट्टी पर हैं। डॉ. रमन अस्पताल के इकलौते सर्जन हैं, जबकि होने पांच चाहिए। मेडिसिन फिजिशियन के रूप में डॉ. बीके सुमन मरीजों की भीड़ से जूझ रहे हैं। दो मेडिसिन फिजिशियन के पद काफी समय से खाली हैं। तीन रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर होने चाहिए, लेकिन एक ही तैनात हैं। इससे अल्ट्रासाउंड समेत एक्सरे कराने वाले मरीजों को काफी परेशानी झेलनी पड़ रही है। सबसे ज्यादा दिक्कत आकस्मिक चिकित्सा अधिकारी की कमी से है। सात स्वीकृत पदों में पांच रिक्त हैं। इससे अन्य डॉक्टरों को ओपीडी छोड़कर जरूरत पड़ने पर इमरजेंसी में मरीज देखने जाना पड़ता है। यहां दो कार्डियोलॉजिस्ट के पद स्वीकृत हैं, लेकिन तैनाती एक डॉक्टर की है। अस्पताल मरीजों को दवा देने में भी नाकाम साबित हो रहा है। ओपीडी के वक्त अस्पताल गेट के सामने के मेडिकल स्टोर पर सरकारी अस्पताल की पंजीकरण पर्ची पकड़े लोगों की भीड़ इसकी गवाही देती है।

मैट्रन नहीं, स्टाफ नर्सों की भी कमी
मैट्रन के दो पद है, लेकिन तैनाती एक की भी नहीं है। इसी तरह प्रिंसिपल ट्यूटर और ट्यूटर के तीन पद हैं, पर सभी रिक्त हैं। स्टाफ नर्स के 39 पद स्वीकृत हैं, लेकिन तैनाती सिर्फ 25 की है।

अटैचमेंट और संविदा का सहारा
पिछले दिनों डॉक्टरों की कमी से बेपटरी हुई व्यवस्था को ढर्रे पर लाने की कोशिश के तहत एक एनेस्थेटिक और एक रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर दूसरे जिलों से यहां अटैच किए गए। इसके साथ ही संविदा पर मिले 82 स्टाफ नर्स और 10 चिकित्सकों से दुश्वारियां कुछ कम हुई हैं।

दशकों से नहीं सृजित हुए नए पद
1906 में बने इस अस्पताल में दशकों से नए पद सृजित नहीं हुए। 305 बेड के इस अस्पताल में अंतिम बार शैय्या की संख्या कब बढ़ाई गई, एसआईसी समेत यहां के तमाम नए-पुराने स्टाफ भी नहीं बता सके। वहीं लगातार मरीजों की संख्या बढ़ रही है। औसतन 2500 मरीज रोज यहां आते हैं।

असुरक्षित है अस्पताल परिसर
जुबली इंटर कॉलेज के छात्र रुस्तमपुर निवासी गोकुल मिश्र सुबह ओपीडी में आए। बाहर खड़ी उनकी साइकिल चोरी हो गई। इससे करीब डेढ़ हफ्ता पहले एक स्वास्थ्य कर्मी की ओपीडी में जेब कट गई थी। पहले भी कई बार यहां चोरी की घटनाएं हो चुकी हैं। अस्पताल में सिर्फ आठ सीसीटीवी कैमरे हैं। इनके जरिए पूरे परिसर की निगरानी संभव नहीं है।

किराया बचाने को दवा में की कटौती
बेटे अमन के गर्दन पर गिलटी का इलाज कराने आई थी। दो दवाएं अस्पताल से मिलीं। तीन दवाएं बाहर खरीदनी पड़ी। साढ़े तीन सौ रुपये खर्च हो गए। पूरी दवाएं ली होती तो घर लौटने का किराया भी नहीं बचता।
-जीरा देवी, झंगहा

हफ्ते भर बाद हुई डॉक्टर से मुलाकात
इससे पहले भी पिछले हफ्ते जिला अस्पताल आई थी। तब डॉक्टर न मिलने पर वापस लौटना पड़ा था। इस बार डॉक्टर मिले और उन्होंने दवा भी लिखी। इसमें एक पेस्ट अस्पताल से नहीं मिला, बाहर से खरीदा।
- सीमा गुप्ता, राजघाट

बाहर से खरीदनी पड़ी दवा
कान में दर्द की शिकायत थी। जिला अस्पताल में डॉक्टर को दिखाया। दो दवाएं अस्पताल से मिलीं। ड्रॉप और कैप्सूल बाहर से खरीदने पड़े। एक रुपया में इलाज कराने आया पर तीन सौ रुपये खर्च हुए।
- आशीष, जंगल चौरी

शीतल पेयजल की टोटियां सूखीं
जिला अस्पताल की इमरजेंसी के आगे लगी शीतल पेयजल की टोटियों को देखकर प्यास बुझाने गई। पता चला कि इनसे महीनों से पानी नहीं निकला। मजबूरी में बोतल बंद पानी खरीदकर प्यास बुझाई।
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- किताबुन्निशा, सरया


दो माह के कार्यकाल में दवाओं की उपलब्धता बढ़ाई है। आया था तब 25 से 30 तरह की दवाएं ही थीं, अब इनकी संख्या 250 के करीब है। पीआईसीयू को मानक के मुताबिक दुरुस्त कराया है। यहां खराब पड़े उपकरण दुरुस्त कराए, साथ ही बर्न वार्ड में खराब एसी बदलवाया गया। साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। डॉक्टरों और अन्य स्टाफ की कमी से परेशानी हो रही है।
- डॉ. आरके गुप्ता, एसआईसी जिला अस्पताल
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