गोरखपुर।
ललित कलाएं पांच बहनों की तरह हैं। वो भी ऐसी जो एक-दूसरे के बिना अधूरी हैं। चित्र, मूर्ति, साहित्य और संगीत से मिलकर मंच बनता है। इन्हीं से नाटक उपजता है और अभिनय भी। इनके बिना कुशल अभिनेता और उत्तम निर्देशक बनना संभव नहीं है। ये बातें गोरखपुर यूनिवर्सिटी के ललित कला विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. भारत भूषण ने रैंपस स्कूल में प्रेमचंद श्रीवास्तव के जन्मदिवस पर गोरखपुर थियेटर एसोसिएशन के कार्यक्रम में कहीं।
उन्होंने कहा कि एक कला को आगे बढ़ाने के लिए दूसरी विधा मददगार साबित होती है। उन्होंने रंगकर्मियों को अभिनय में निखार लाने के लिए स्वाद परिवर्तन की सलाह दी। कहा, थोड़ा प्रयास इन कलाओं के लिए भी करें। मुख्य वक्ता देवेंद्र आर्य ने कहा कि अकेले किसी कला का विकसित हो पाना कठिन है, खासकर रंगकर्म के लिए। एक रंगकर्मी समाज से जुड़े बिना अच्छा मंच प्रस्तोता नहीं हो सकता। नाटक के लिए स्क्रिप्ट जरूरी है। चित्र, मूर्ति, और संगीत को एक बार के लिए रंगकर्मी नजरअंदाज भी करे तो भी वह किसी सूरत में साहित्य से मुंह नहीं मोड़ सकता। इससे पहले रंगकर्मी प्रदीप प्रविज्ञ ने कहा कि आज के दौर में रंगकर्मियों में थोड़ी निराशा है, लेकिन हताश होने की जरूरत नहीं। परिस्थितियां कैसी भी हों, रंगकर्म कभी खत्म नहीं होगा। विशिष्ट अतिथि डॉ. शरद मणि त्रिपाठी ने प्रेमचंद द्वारा गोरखपुर थियेटर एसोसिएशन की स्थापना का उद्देश्य जाहिर करते हुए कहा कि यह सिर्फ एक संस्था नहीं थी बल्कि हर उस विधा के संरक्षण एवं संवर्धन का प्रयास था जिससे रंगकर्मी जुड़े थे। रविशंकर खरे ने बाहर के रंगकर्मियों को भी नाट्य मंचन के लिए आमंत्रित करने की अपील की। संचालन मानवेंद्र त्रिपाठी ने किया। मुमताज खान, शैवाल श्रीवास्तव, प्रेमशंकर आदि मौजूद रहे।
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नए अध्यक्ष और सचिव का मनोनयन हुआ
गोष्ठी से पूर्व गोरखपुर थियेटर एसोसिएशन के नए अध्यक्ष और सचिव का मनोनयन हुआ। प्रेमचंद की पुत्री विनीता श्रीवास्तव को अध्यक्ष और रंगकर्मी रवींद्र रंगधर को सचिव मनोनीत किया गया। इसके साथ ही रंगकर्मियों के लिए प्रेमचंद रत्न पुरस्कार और प्रेमचंद रंग पुस्तकालय स्थापित करने की अपील की गई।
मुफ्त रंगकर्म की प्रस्तुति की परंपरा खत्म हो
मुख्य वक्ता देवेंद्र आर्य ने रंगकर्म के विकास के लिए रंगकर्मियों से मुफ्त रंगकर्म का प्रदर्शन करने की परंपरा खत्म करने की अपील की। उन्होंने कहा कि जरूरी है कि एक काउंटर। जहां लोगों को टिकट दिया जाए, भले ही जो लोग टिकट न खरीदना चाहें उन्हें मुफ्त में मंचन देखने दिया जाए।