पत्नी का शव बाइक पर ले जा रहे बिहार के शख्स की तस्वीर अभी लोग भूले नहीं थे कि शहर में मानवता को शर्मसार करता ऐसा ही दृश्य नुमाया हो गया। सीएम के शहर में शव वाहन की सुविधा होने के बाद भी तीन लाशों को ठेले पर लादकर करीब 12 किलोमीटर दूर मेडिकल कॉलेज ले जाया गया। इससे पहले जिला अस्पताल की मोर्चरी में इन शवों पर कफन सिलने और पोस्टमार्टम हाउस तक पहुंचाने की एवज में रोते-बिलखते परिजनों से सैकड़ों रुपये वसूले गए।
मंगलवार को जिला अस्पताल की मोर्चरी में मियां बाजार के मुन्नालाल (45) का शव पड़ा था। उनकी मौत के बाद परिवारवालों के साथ अमर शाह जिला अस्पताल की मोर्चरी पहुंचे थे। परिवारवाले शव के लिए कफन लेकर आए लेकिन वहां मौजूद स्वीपर ने शव पर कफन सिलने के नाम पर 1500 रुपये की मांग कर दी। नटनी, खजनी की रहने वाली एक साल की बच्ची चंदा के शव के साथ भी ऐसा ही हुआ। चंदा की मां कृष्णावती एक ओर चीत्कार के साथ रो-रोकर बदहवाश हो रही थी तो दूसरी ओर उनके पति स्वीपर से बेटी के शव पर कफन सिलने के लिए मिन्नत कर रहे थे। एक अन्य शव के साथ भी ऐसा ही हो रहा था।
पोस्टमार्टम के लिए शव को जिला अस्पताल से मेडिकल कॉलेज तक ले जाने के नाम पर भी धनउगाही की पूरी व्यवस्था बनाई गई थी। जिला अस्पताल में शव वाहन होने के बाद भी दलाल अपना धंधा जमाए हुए थे। शव ठेले पर ले जाने का रेट 1800 तो एंबुलेंस से पहुंचाने के लिए 2800 रुपये की मांग हो रही थी। रोते-बिलखते परिवारवाले कभी स्वीपर के आगे गिड़गिड़ाते नजर आए तो कभी ठेले वाले के सामने हाथ जोड़े लेकिन उनके आंसुओं का असर नहीं हो रहा था। इस बीच मुन्नालाल के परिवारवालों ने बीच का रास्ता अपनाया। काफी कोशिश के बाद 1300 रुपये में बात बनी। इसके बाद स्वीपर ने शव पर कफन चढ़ाया, फिर इसे ठेले पर लादकर मेडिकल कॉलेज के लिए रवाना किया। चंदा के परिवार ने भी यही रास्ता चुना। तीसरे शव के साथ मौजूद लोग भी संवेदनहीन दलालों के साथ मोलभाव की कोशिश में जुट गए।
जिला अस्पताल में दो शव वाहन हैं। एक फोन पर इसे निशुल्क जरूरतमंदों को दिया जाता है। दलालों के चक्कर में न पड़कर लोगों को शव वाहन का इस्तेमाल करना चाहिए।
- डॉ. दिनेश सोनकर, एसआईसी
इसकी जांच कराई जाएगी। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। मोर्चरी में एक सिपाही की तैनाती की जाएगी ताकि इस तरह की घटनाएं न हों।
- डॉ. पुष्कर आनंद, एडी हेल्थ
इन तस्वीरों ने खोली थी संवेदनहीन व्यवस्था की पोल
रविवार को पूर्णिया के रानीबाड़ी गांव के शंकर शाह की पत्नी सुशीला देवी की मौत के बाद स्थानीय सदर अस्पताल में मौत होने के बाद शव ले जाने के लिए वाहन नहीं मिला तो वो बेटे के साथ बाइक पर पत्नी की लाश घर लेकर गए। वहीं कुछ दिन पहले मुजफ्फरपुर में एक महिला के शव को कूड़ा ढोने वाले ठेले से ले जाया गया था। इसके पहले कालाहांडी, उड़ीसा के दाना मांझी की तस्वीर ने संवेदनहीन व्यवस्था की सच्चाई दिखाई थी। तब दाना मांझी ने बेटी के साथ पत्नी का शव 12 किलोमीटर तक कंधे पर ढोया था।
जिला अस्पताल में हैं दो शव वाहन
जिला अस्पताल में शव ढोने के लिए प्रदेश सरकार की ओर से पिछले दिनों दो शव वाहनों की व्यवस्था की गई थी। इस फोन पर जरूरतमंदों को इस्तेमाल के लिए इन वाहनों को दिया जाता है। इसके बदले किसी तरह का कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। इसके बाद भी जिला अस्पताल की मोर्चरी में दलालों का धंधा चोखा है। जिला अस्पताल में दो वातानुकूलित शव वाहन होने के बाद भी यहां ठेले पर शव की ढुलाई होती है। दलालों की ओर से मृतकों के परिजनों को वाहन से शव ले जाने का खर्च 2800 बताया जाता है।