यूनिवर्सिटी में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
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गोरखपुर यूनिवर्सिटी के दर्शनशास्त्र विभाग और शैक्षिक महासंघ की ओर से शनिवार को ‘भारतीय उच्च शिक्षा : यथार्थ एवं आकांक्षाएं’ विषय पर दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान वक्ताओं ने देश की वर्तमान उच्च शिक्षा की स्थिति पर चिंता जताते हुए इसकी बेहतरी के लिए शोध की आवश्यकता जताई और कहा कि देश की पुरातन संस्कृति को अपनाकर फिर से देश को विश्व गुरु बना सकते हैं।
शनिवार को संवाद भवन में मां सरस्वती और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चित्र पर माल्यार्पण के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। मुख्य अतिथि एकात्म मानववाद शोध एवं विकास संस्थान के निदेशक डॉ. महेश चंद्र शर्मा ने कहा कि शिक्षा समाज का शैक्षिक आयाम है और इस आयाम की शुरुआत मां से होती है। ऐसे में शिक्षा की बेहतरी के लिए परिवार संस्था को मजबूत बनाने की आवश्यकता है। कुलपति प्रो. विजय कृष्ण सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में उच्च शिक्षा की स्थिति बहुत ही खराब है। एक लाख से ज्यादा शोध में मात्र चार या पांच ही अंतरराष्ट्रीय स्तर के होते हैं। विशिष्ट अतिथि पूर्व कुलपति प्रो. अशोक कुमार ने कहा कि उच्च शिक्षा का अर्थ होता है चिंतन, शोध, आविष्कार, लेकिन आज शिक्षा केवल रोजगार पैदा करने वाली होकर रह गई है। इसके लिए जरूरी है कि पाठ्यक्रम से शिक्षकों को बांधने के बजाए उन्हें चिंतन की छूट देनी होगी।
महात्मा ज्योतिबाफुले रूहेलखंड विश्वविद्यालय बरेली के कुलपति प्रो. अनिल शुक्ला ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं बल्कि आचरण में और व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन करना है। इसके लिए समाज को अच्छे रोल मॉडल चाहिए, जिसकी आज के शिक्षा व्यवस्था में नितांत कमी हो गई है। दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. डीएन यादव ने अतिथियों का परिचय कराया। संचालन महासंघ के सचिव डॉ. आमोद राय ने किया। तकनीकी सत्र में डॉ. बलवान सिंह, डॉ. शशिप्रभा सिंह, डॉ. विजयानंद सिंह, डॉ. कौस्तुभ नारायण मिश्र, प्रो. नरेश प्रसाद भोक्ता ने संगोष्ठी के विषय पर केंद्रित अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।