गोरखपुर।
मेडिकल कॉलेज के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) और इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के वैज्ञानिकों ने स्क्रब टायफस को एईएस (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम) का संभावित कारण माना है और इसके निदान के लिए चिकित्सकों को सुझाव भी दिया है।
पूर्वांचल के मासूमों के लिए जेई के बाद अब काल का पर्याय बनी एईएस पर काबू पाने के लिए शुक्रवार को चिकित्सा जगत के विद्वान एनआईवी सेंटर में जुटे, जहां आईसीएमआर दिल्ली की वैज्ञानिक डॉ. निवेदिता गुप्ता ने विभिन्न संस्थाओं की मदद से हुए शोध की जानकारी दी। बताया कि गोरखपुर, असम, कर्नाटक, लखनऊ आदि स्थानों पर जुटाए गए एईएस मरीजों के सैंपल की जांच में 60 फीसदी में स्क्रब टायफस मिले। ऐसे मरीजों को अगर प्राइमरी स्टेज में डॉक्सीसाइक्लिन या एरिस्थ्रोमाइसिन दवा दी जाए तो बीमारी पर काबू पाया जा सकता है।
आईसीएमआर के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. एमडी गुप्ते ने स्क्रब टायफस को एईएस का संभावित कारण बताते हुए आगे होने वाले शोध में तस्वीर और साफ होने की बात कही। उन्होंने अब तक आए नतीजों के हवाले से सभी सीएमओ एवं चिकित्साधिकारियों से बीमारी पर अंकुश लगाने पर भी चर्चा की। मेडिकल कॉलेज एईएस सेल की डॉ. महिमा मित्तल ने 298 एईएस मरीजों की जांच में सामने आए तथ्य का पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटशन दिया। इसमें भी स्क्रब टायफस को एईएस की संभावित वजह करार दिया गया। उन्होंने जोर दिया कि अगर मरीजों को शुरुआती चरण में ही डॉक्सीसाइक्लिन या एरिस्थ्रोमाइसिन दी जाए तो कई जानें बचाई जा सकती हैं।
एनआईवी के इंचार्ज डॉ. वीपी डोंड्रे ने भी एईएस पर हुए शोध कार्यों की प्रगति बयां की। कमिश्नर अनिल कुमार ने एईएस के खात्मे के लिए जारी शोध को पूरी मदद दिलाने का भरोसा दिया। कॉलेज प्राचार्य डॉ. आरके मिश्र ने उम्मीद जताई कि एनआईवी और आईसीएमआर के प्रयासों से इस साल इंसेफेलाइटिस से होने वाली मौतों का आंकड़ा कम किया जा सकेगा।
सीएमओ से पूछी तैयारियां
डॉ. एमडी गुप्ते ने कार्यशाला में आए गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर और महराजगंज के सीएमओ से इंसेफेलाइटिस मरीजों के इलाज की व्यवस्था पूछी। गोरखपुर के सीएमओ ने बताया कि 19 ब्लॉकों में 22 इंसेफेलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर समेत जिला अस्पताल में भी एक ईटीसी संचालित है। दवा की उपलब्धता पर उन्होंने एरिस्थ्रोमाइसिन का सिरप न होने की जानकारी दी। देवरिया में डॉक्सीसाइक्लिन तो वहीं कुशीनगर और महराजगंज में एरिस्थ्रोमाइसिन न होने की बात सामने आई।
आशा से बड़ी आस
डॉ. एमडी गुप्ते ने एईएस पर अंकुश लगाने के लिए सीएमओ से आशा कार्यकर्ताओं की मदद लेने का आह्वान किया। कहा कि बीमारी से मौत की अहम वजह यह है कि मरीज मर्ज बिगड़ने के बाद अस्पताल पहुंचते हैं। ऐसे में उन पर दवा कारगर नहीं हो पाती। ऐसे में लक्षण पहचानकर अगर उन्हें शुरू में ही दवा की डोज दे दी जाए तो बीमारी के निदान में बड़ी सहूलियत होगी। अभियान से आशा को जोड़कर मरीजों को समय से ईटीसी पहुंचाकर उन्हें सही इलाज मुहैया कराया जा सकेगा।
ये है स्क्रब टायफस
करीब ढाई साल पहले एईएस मरीजों में स्क्रब टायफस की पहचान शोधकर्ताओं ने की थी। यह एक तरह का बैक्टीरिया है जो एक खास प्रकार के कीड़े की लार में पाया जाता है। यह कीड़ा बड़े घास के मैदान, चूहों या गिलहरियों के शरीर में रहता है। जूं की तरह का यह कीड़ा जब बच्चों को काटता है तो यह बैक्टीरिया लार के साथ बच्चों के खून में मिल जाता है।
खतरे भारी फिर भी नहीं छूट रही लापरवाही
सिद्धार्थनगर, संतकबीरनगर और बस्ती में हर साल इस बीमारी से कई जानें जाती हैं। इसके बाद भी बस्ती मंडल के किसी भी जिले से स्वास्थ्य महकमे का कोई भी प्रतिनिधि कार्यशाला में शामिल होने नहीं पहुंचा। हालांकि, यह जानकारी जब तक आम हुई तब तक कमिश्नर कार्यशाला को संबोधित कर निकल चुके थे।