गोरखपुर। चलिए, परलोक-मोक्ष की फिक्र की बात जाने दीजिए, पर जीवन में सुख-शांति और सफलता तो सभी चाहते हैं। जरा सोचें, यदि तन-मन पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो तो क्या सफलता दूर रह सकती है। एक बात और, तन की तमाम बीमारियों का कारण भी तो मन ही है। बढ़ती महत्वाकांक्षाएं, तनाव-अवसाद कितने शारीरिक-मानसिक रोगों का कारण हैं, इसकी फेहरिस्त छोटी नहीं। महायोगी गोरखनाथ ने क्रियात्मक योग के रूप में युगों पहले जो महामंत्र दिया, वह आधुनिक जीवन के भी हर सवाल का सटीक उत्तर है।
इस आलेख शृंखला का संदर्भ गोरखनाथ मंदिर में लगने वाला मेला है। यही स्थान पूर्व मध्यकाल में महायोगी गोरखनाथ की तपस्थली रही। उन्होंने तब नाथपंथ और योग के रूप में आध्यात्मिक-सामाजिक पुनर्जागरण की जो अलख जगाई थी, वह सार्वकालिक हो गई। बाद के पंथों पर भी उसका प्रभाव स्पष्ट है। योग भारत की अत्यंत प्राचीन आध्यात्मिक विद्या है। महायोगी गोरखनाथ ने लेकिन उस प्राचीन योग-दर्शन को क्रियात्मक योग में बदलकर संपूर्ण मानव समाज को तन-मन स्वस्थ और उसे नियंत्रण में रखने का अचूक मंत्र दे दिया। हर युग के समाज के लिए यह उनका अमूल्य उपहार है। सामान्यजन हों या साधक, योगमार्ग तो अनंत तक पहुंचने की राह है। अब यह साधक पर निर्भर है कि वह कितनी दूर तक चलता है। वह तन-मन के आरोग्य तक भी रुक सकता है और चाहे तो इससे आगे बढ़कर, इन पर ही नहीं, प्रकृति तक पर नियंत्रण करने की क्षमता पा सकता है।
पूरे संसार में योग का डंका
सांख्य-दर्शन के प्रवर्तक कपिल का संाख्य योग प्राचीनतम योग-दर्शन है। पतंजलि ने इसे व्यवस्थित व विकसित दर्शन के रूप लिपिबद्ध किया। यही पातंजलि योग-दर्शन के नाम से जाना गया। पर यह योग ऋषियों-तपस्वियों के आश्रमों तक सिमटा रहा। सामान्यजन के लिए यह गूढ़, दुरूह व असाध्य ही माना जाता रहा। महायोगी गोरखनाथ ने इसके क्रियात्मक पक्ष को इतने सरल रूप में पेश किया कि कोई भी इसे अपना सके। यह वही योग है जिसे पूरी दुनिया अपना रही है।
योग का व्यावहारिक रूप
पहले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (2015) की पूर्व संध्या पर यहां हुए समारोह में राज्यपाल राम नाईक ने भी कहा कि योग को आमजन के लिए सुलभ कराने का श्रेय महायोगी गोरखनाथ और उनके योगियों को है। यहीं मुख्यमंत्री और गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने बताया कि प्रवर्तित पातंजलि योग दर्शन एवं महायोगी गोरक्षनाथ द्वारा प्रतिष्ठापित क्रियात्मक योग, दोनों पद्धतियां एक-दूसरे की पूरक हैं। पतंजलि ने योग के सैद्धांतिक तो महायोगी ने व्यावहारिक रूप को सिद्ध किया।