सिद्धार्थनगर। रामकुमार की मौत ने गांव व आसपास के लोगों को झकझोर दिया है। मौत की सूचना पर जब लोग जुटे और पता चला कि तीन दिन से घर में अनाज न होने के कारण चूल्हा नहीं जला तो लोग अपनी पीड़ा दबा न सके। बरबस ही आंखों से आंसू निकल पड़े।
पत्नी रीना का रो-रोकर बुरा हाल हो गया है। चार वर्षीय बीमार बेटा विजय बार-बार यही जिद कर रहा था कि मां मुझे पापा के पास ले चलो। यह शब्द लोगों को बिलखने पर विवश कर दे रहा है। छह वर्षीय पुत्र विशाल गुमसुम होकर एक स्थान पर बैठा हुआ है। नौ माह के अजय को पता नहीं है कि अब उसके पापा उसके बीच नहीं हैं। मां व भाई को रोते और घर पर लोगों को पहुंचाता देख वह हैरत भरी निगाहों से लोगों को देख रहा है। यहां पहुंचे लोग परिवार की मुफलिसी देखकर भगवान से यही कहते सुने गए कि प्रभु किसी को भी इतनी गरीबी मत दे कि वह जिंदगी से तंग आकर जान दे दे।
काश! एक-एक हजार के नोट चल जाते
रामकुमार की मौत के बाद रीना जब घर में कागजातों को ढूंढ़ रही थी तो उसे बंद हो चुके एक-एक हजार के पुराने नोट मिले, जिसे देखकर वह दहाड़े मारकर रोने लगी। उसकी जुबां से बस एक ही शब्द निकल रहे थे कि काश ये नोट चल पाते। रीना ने बताया कि इन नोटों को वह बदल नहीं सकी। इस कारण घर में पड़े थे।
प्रधान बोलीं, हरसंभव मदद का प्रयास करूंगी
ग्राम प्रधान विनीता यादव ने बताया कि मुझे पता नहीं था कि रामकुमार के घर में तीन दिन से अनाज के अभाव में खाना नहीं बना है। यह जानकारी तब हुई जब आज सुबह उसकी मौत की खबर सुनकर उसके घर पहुंची। मेरे द्वारा उसके पत्नी एवं बच्चों को जो भी सरकारी मदद मिलनी चाहिए उसके लिए भरपूर प्रयास करूंगी। वहीं पड़ोसी जीतेंद्र वर्मा, अशोक कुमार, पप्पू गुप्ता का कहना है कि वह बेहद स्वाभिमानी व्यक्ति था। उसने कभी भी इस बात का जिक्र नहीं किया कि उसके घर में खाने को नहीं है। नहीं तो पूरी मदद की जाती।