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कलश स् थापना से शुरू होगी देवी उपासना

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गोरखपुर।
शक्ति की उपासना के महापर्व से पूर्व घरों और बाजारों में देवी पूजा से जुड़ी तैयारी और खरीदारी का सिलसिला बुधवार को पूरे दिन चला। गुरुवार को कलश स्थापना के साथ घरों और पंडालों में देवी उपासना का क्रम शुरू होगा। हालांकि सार्वजनिक पूजा पंडालों में कलश स्थापना का षष्ठमी तिथि को होगी।
देवी पूजा के लिए घरों में महिलाएं पूरे दिन तैयारी में जुटी रहीं। रुस्तमपुर की रागिनी ने बताया कि फलाहार की व्यवस्था से लेकर साफ-सफाई में समय कब गुजर गया, पता ही नहीं चला। शाम को बाजार से पूजन सामग्री की खरीदारी की। महिलाएं ही नहीं पुरुष भी इसमें पीछे नहीं रहे। बाजार में पूजा सामग्री की दुकानों पर पुरुषों की भी भीड़ लगी रही। इसके साथ ही फल और किराने की दुकानों पर भी रोज के मुकाबले भीड़ ज्यादा दिखी।
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पंडालों पर पसीना बहाते रहे सदस्य
देवी पूजा पंडालों पर बुधवार को तैयारियों में तेजी दिखी। रेलवे स्टेशन, धर्मशाला बाजार, तरंग, बक्शीपुर, रुस्तमपुर आदि इलाकों में स्थापित पंडालों में समिति सदस्यों ने पूरे दिन पसीना बहाया। अधिकतर पंडाल लगभग तैयार हो चुके हैं। कुछ बड़े पंडालों में मूर्तियां भी बन रही हैं। वहीं अधिकतर में मूर्तियां बाहर से लाई जानी हैं।

शुभ संयोग बना रहे हैं नवरात्र को खास
ज्योतिषाचार्य पंडित नरेंद्र उपाध्याय ने बताया कि नवरात्र इस बार हस्त नक्षत्र में शुरू हो रहा है। इस नक्षत्र में नवरात्र की शुरुआत को मंगलकारक माना गया है। इसके साथ ही इस बार शुक्र और शोभन योग भी देवी उपासना के इस पर्व को खास बना रहे हैं। नवरात्र के पहले दिन शुक्र और शोभन योग का बनना देवी भक्तों के लिए फलदायक होगा।

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य पंडित नरेंद्र उपाध्याय ने बताया कि मत्स्य पुराण के मुताबिक देवी की कलश स्थापना और विसर्जन दिन में ही श्रेयष्कर बताया गया है। गुरुवार दिन में प्रतिपदा तिथि के दौरान कलश स्थापना शुभ होगी। सबसे उत्तम सुबह का मुहूर्त है।
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यह है नवरात्र की पूजन विधि
पंडित शरद चंद्र मिश्र नवरात्र पूजा की शुरुआत गौरी और गणपति पूजन से होती है। इसके बाद वेदी बनाकर इस पर सात अनाज बिखेरकर अष्टदल कमल बनाया जाता है। इसके मध्य में जल से भरा कलश रखा जाता है। कलश में सर्व औषधि, सप्त मृतिका, पंच रत्न, सुपारी, हल्दी, सिक्का और पुष्प इत्यादि डालकर वेद मंत्रों से कलश की स्थापना की जाती है। इसके दाएं तरफ 16 मातृकाएं और बाई ओर नवग्रहों की स्थापना की जाती है। कलश के पास ही एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर माता दुर्गा की प्रतिमा या त्रिशूल स्थापित किया जाता है। इसी पर माता की आराधना नवमी तिथि तक की जाती है।
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