गोरखपुर।
शारदीय नवरात्र के पांच दिन बीत चुके हैं। सार्वजनिक पूजा पंडालों में भी सप्तमी से देवी के दर्शन सुलभ होंगे। शहर में कई ऐसे पंडाल भी हैं जहां प्रतिमा का आकार तो बदलता रहा लेकिन दशकों से देवी का सौम्य रूप ही बनाए रखा गया है। बंगाली रीति-रिवाज से पूजा और प्राचीनता इन समितियों को शहर में सबसे अलग करती है। प्रतिमा की साज-सज्जा भी सबसे अलग होती है।
दुर्गाबाड़ी
बदलता है प्रतिमा के चेहरे का भाव
बंगाली समिति दुर्गाबाड़ी में 110 सालों से मां की प्रतिमा स्थापित करा रही है। 1952 में समिति को अपनी स्थाई जमीन भगवती प्रसाद रईस के सौजन्य से नसीब हुई। तब से उसी स्थान पर मां की प्रतिमा स्थापित की जाती है। समिति के सचिव अरुण कुमार सरखेल बताते हैं कि इन वर्षों में मां की प्रतिमा की लंबाई व साज-सज्जा में परिवर्तन किया गया है लेकिन देवी का चेहरा नहीं बदला। गत 40 वर्षों से देवी का यही शांत रूप देखते आ रहे सरखेल बताते हैं कि यह अवधि तो ज्ञात है, यह परंपरा और पुरानी हो सकती है। पिछले कई सालों से एक ही कलाकार का परिवार समिति प्रतिमा को बनाता आ रहा है। वहीं साज-सज्जा कर मां को विशेष रूप देता है। बताया कि जैसे-जैसे नवरात्र बीतता है, मां के चेहरे के भाव में अंतर दिखने लगता है। यही वजह है कि यहां काफी भीड़ जुटती है।
धर्मशाला
होड़ से दूर, परंपरा का पालन
दुर्गा पूजा विद्यार्थी समिति धर्मशाला 45 वर्षों से मां की प्रतिमा स्थापित करा रहे हैं। तब से लेकर आज तक प्रतिमा में समिति ने कोई बदलाव नहीं किया। मां की शांत रूप वाली प्रतिमा समिति की पहचान बन गई है। महज प्रतिमा के आकार में हर साल बदलाव होता आया है। समिति के अध्यक्ष सतीश यादव बताते हैं कि इस बार मां की शांत रूप वाली 16 फीट की प्रतिमा बनवाई गई है। पंडाल को मंदिर का रूप दिया गया है। इसके अलावा कोई बदलाव नहीं किया गया। वह इसके पीछे का कारण बताते हैं कि ऐसी प्रतिमा शहर में कोई स्थापित नहीं करता है, जबकि शहर में इतने वर्षों में लोगों ने मां की प्रतिमा में बदलाव भी किए हैं लेकिन हमारी समिति पुराने परंपरा को कायम किए हुए है और आगे भी यही रूप मां का रहेगा।