फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आप ध्यान से सुनें तो सही, जीवन के अद्भुत संदेश सुनाता है खिचड़ी मेला

Tue, 15 Jan 2019 01:47 AM IST
ajay Kumar Gorakhpur, Uttar Pradesh, India
विज्ञापन
gorakhnath temple - फोटो : gorakhnath temple
विज्ञापन
गोरखपुर। यह भारतीय संस्कृति विशेषता है कि यहां हर पर्व-त्योहार की रस्में प्रतीकात्मक होती हैं। इन प्रतीकों में गहरे संदेश छिपे होते हैं। इन गूढ़ संदेशों को समझा और आचरण में उतारा जा सके तो मानव जीवन का सूर्य भी उत्तरायण होता दिखेगा। मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने और शुभ कार्यों की घड़ी उदित होने का उद्घोष है। ऐसे ही गोरखनाथ मंदिर पर लगने वाले खिचड़ी मेले के भी कई प्रतीकात्मक पहलू हैं।
विज्ञापन


महायोगी गोरखनाथ के खप्पर (भिक्षापात्र) के न भरने की कथा को ही ले लें। यह न तो कभी भरता है और न कभी खाली होता। वस्तुत: खप्पर प्रतीक है, उस अन्नकोश का जो भरकर भी अधूरा रहता है ताकि और मानव अस्तित्व के लिए अन्न की महत्ता बनी रहे। मकर संक्रांति पर देश-विदेश के नाथपंथी साधु, अनुयायी और श्रद्धालु अपनी श्रद्धा की जो खिचड़ी चढ़ाते हैं वह महायोगी गोरक्षनाथ के खप्पर को भरने की कोशिश का तो खिचड़ी ऋषि-कृृषि एकता की प्रतीक है। यह कृषि प्रधान देश में अन्न की प्रतिष्ठा भी है। खिचड़ी साधुओं का प्रिय भोज्य है। चावल-दाल के मेल से बनी खिचड़ी सामाजिक समरसता और सात्विकता का प्रतीक है। अन्नदान भूखे को भोजन कराने के सामाजिक दायित्व की प्रेरणा है। महायोगी का खप्पर खाली न होना पूर्णता है तो न भरना संतोष। यानी संग्रह सिर्फ जरूरत भर। खिचड़ी चढ़ाएं ही नहीं, समरसता, सात्विकता और सामाजिक दायित्वों को जीवन में उतारें भी। इस तरह लौकिक जीवन को योग के आनंद के साथ जीते हुए ‘परम आनंद’ की ओर बढ़ें। मेला यह संदेश देता है।

किवदंती जो प्रचलित है

कहा जाता है कि त्रेता युग में गोरक्षनाथ घूमते हुए हिमाचल के प्रतिष्ठित शक्ति पीठ ज्वाला देवी के मंदिर पहुंचे। देवी ने आतिथ्य स्वीकारने का आग्रह किया। वहां की शाक्त परंपरा वाले भोजन से बचने के लिए उन्होंने देवी को बताया कि वह भिक्षा में मिले अन्न से बनी खिचड़ी ही खाते हैं। देवी से पानी गरम करने और भिक्षान्न से खप्पर भर कर लौटने की कह महायोगी भिक्षाटन पर निकले। मांगते-मांगते गोरखपुर तक आ गए। यहां खप्पर रखा दिया। श्रद्धालु उसमें खिचड़ी के अन्न चावल-उड़द, तिल, घी चढ़ाते गए। खप्पर खाली का खाली रहा। जब गोरखनाथ उसी खप्पर से ही भक्तों को खिचड़ी प्रसाद देने लगे, तो कभी खाली ही न हुआ। फिर महायोगी यहीं तपस्यारत हो गए। न खप्पर भरा और न वे ज्वाला देवी लौटे। आज भी ज्वाला देवी मंदिर में खौलते पानी का कुंड है।

एक संदेश शहरवासियों का भी

खप्पर का न भरना गोरखपुरवासी अपने ऊपर गुरु गोरखनाथ की कृपा मानते हैं। इस मेले में प्रत्येक रविवार एवं मंगलवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। शहर के लोग बुढ़वा मंगल को ही खिचड़ी चढ़ाते हैं। इसके पीछे भी एक सुंदर सदेश छिपा है। जब मेले में भीड़ बढ़ने लगी तो शहरवासियों ने अपने लिए संक्त्रसन्ति के बाद दूसरा मंगलवार तय किया ताकि बाहर से आने वालों को दर्शन में दिक्कत न हो। यह दिन उन सभी लोगों के लिए भी होता है जो संक्रांति पर खिचड़ी न चढ़ा सके हों।

जरूरत की चीजें, फिर मनोरंजन

दूर-दूर से आने वाले भक्त एक-दो दिन पहले आते और गुरु गोरखनाथ की कृपा-छत्र में ठहरते। संख्या बढ़ी तो मकर संक्रांति पर मेला लगने लगा। घरेलू उपयोग वस्तुओं की दुकानों से लेकर कालांतर में मनोरंजन के साधन भी इसमें जुड़ते रहे। संक्रांति पर गोरखनाथ मंदिर की ओर से सहभोज होता है। यह महायोगी द्वारा अपने खप्पर से श्रद्धालुओं को बांटी गई खिचड़ी का प्रतीक है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रसाद स्वरूप खिचड़ी ग्रहण करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें