सातवीं जुडो कराटे प्रतियोगिता में हिस्सा लेने पहुंचे करमपाल।
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गोरखपुर। ‘हर रोज गिरकर भी मुकम्मल खड़े हैं, ऐ जिंदगी देख मेरे हौसले तुझसे भी बड़े हैं’। यह पंक्तियां जूडोका करमपाल पर खूब जंचती हैं। आंखों से दिव्यांग होने के बाद भी जब वह जूडो के मैट पर उतरते हैं तो तमगे पर कब्जा जमाकर ही लौटते हैं। एशियाड की पैरा ओलंपिक खेलों में कांस्य और वियतनाम में हुई अंतरराष्ट्रीय जूडो प्रतियोगिता में सिल्वर मेडल जीतने वाले करमपाल इस समय अपने खेल से गोरखपुरवासियों का दिल जीत रहे हैं।
यहां हो रही सातवीं राष्ट्रीय दृष्टिबाधित एवं मूकबधिर जूडो प्रतियोगिता के फाइनलिस्ट करमपाल का हौसला वाकई जिंदगी से बड़ा है। अभावों के बीच बीते बचपन से कामयाबी की बुलंदी तक की करमपाल की कहानी भावुक कर देती है। संघर्षों का सिलसिला पैदा होने के साथ शुरू हो गया। हरियाणा के जींद के गांव में पले-बढ़े करमपाल बताते हैं कि किसान मामा बलवान साधुराम ने बेटे जैसा प्यार दिया। शुरू में गांव के दूसरे बच्चे तो दूरी बनाकर रखते थे, मगर धीरे-धीरे वह भी घुल-मिल गए। आज सभी मेरा उत्साहवर्धन करते हैं। खेल के मैदान में सबसे पहले 2009 में एथलेटिक्स में उतरने का मौका मिला। 2009-2013 तक पैराएथलेटिक्स की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 15 पदक हासिल किए। 2014 में इंडियन ब्लाइंड एंड पैरा जूडो एसोसिएशन के संस्थापक मुनव्वर अंजार से मुलाकात हुई। उन्होंने जूडो का रास्ता दिखाया। कोच के रूप में अर्जुन अवार्डी अकरम का साथ मिला तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
हरियाणा सरकार ने किया उत्साहवर्धन
करमपाल ने बताया कि हरियाणा सरकार ने 2014-18 के बीच विभिन्न प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन करने पर करीब 65 लाख रुपये नकद पुरस्कार प्रदान कर चुकी है।
ओलंपिक में पदक हासिल करने की तमन्ना
करमपाल बताते है कि देश को पैराओलंपिक जूडो में पदक दिलाना ही उनके जीवन का लक्ष्य है। इसके लिए वो जी-जान से जुटे हैं। पहली बाधा ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने की है।
ये हैं उपलब्धियां
राष्ट्रीय जूडो पैराओलंपिक गेम्स में 2014-18 तक चार गोल्ड और एक सिल्वर मेडल, पैरा ओलंपिक एशियाड-2014 में ब्रांज, वियतनाम में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पैराओलंपिक जूडो प्रतियोगिता में गोल्ड पर कब्जा जमाया।