खरगूपुर बाजार में पीतल व फूल के बर्तनों की सफाई के लिए लगे उपकरण। - संवाद
खरगूपुर। जिले में कभी पीतलनगरी के नाम से प्रसिद्ध खरगूपुर अपनी पहचान खो चुका है। अब यहां फूल व पीतल के बर्तन बनना बंद हो गए हैं। पहले यहां 300 कारीगर अपने-अपने घर में लघु उद्योग लगाकर बर्तन बनाते थे। कोई आर्थिक सहयोग न मिलने से व्यापारियों ने दूसरे व्यवसाय की ओर रुख कर लिया।
खरगूपुर में बनने वाले फूल, पीतल व कांसा के बर्तनों की खनक मंडल ही नहीं, पड़ोसी देश नेपाल तक थी। यह प्राचीन कस्बा अपनी पहचान खो चुका है। पूर्व में यहां लघु उद्योग लगाकर दर्जनों लोग फूल व कांसा के बर्तनों का निर्माण करते थे। जिले के अलावा बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, बाराबंकी, फैजाबाद आदि स्थानों के साथ ही नेपाल तक यहां के बने बर्तन बिकते थे। खरगूपुर को पीतलनगरी के नाम से जाना जाता था। तमाम जिलों के व्यापारी आकर यहां बर्तनों की खरीदारी सस्ते दाम में करते थे। धीरे-धीरे यह धंधा मंदा पड़ गया। सरकार से कोई सहयोग न मिलने से व्यापार लगभग बंद हो गया। व्यवसायी अब दूसरे कार्यों में लग गए हैं। धनतेरस व दीपावली के समय अस्थायी दुकान लगाकर दर्जनों लोग यहां बर्तन का धंधा करते हैं।
उपायुक्त उद्योग बाबूराम का कहना है कि व्यापारियों को जरूरत के अनुसार मदद दी जा रही है। इसके लिए सरकार कई योजनाएं चला रही हैं। लोग विभाग में संपर्क करें। सुविधा और सहूलियत उपलब्ध कराई जाएगी।
व्यापारियों का दर्द
काली प्रसाद ठठेरा ने बताया कि सरकार से कोई सहयोग न मिलने के कारण लगभग 20 वर्ष पहले यहां बर्तन बनना बंद हो गए। अब यहां के बर्तन व्यवसायी दुकानों पर बेचने के लिए बाहर के कारखानों से फूल, कांसा, पीतल, तांबा के बर्तन लाते हैं। राजू रस्तोगी ने बताया कि पैसे की कमी ने पहचान छीन ली है। यहां के कारीगरों के पास कारीगरी तो थी लेकिन पैसे नहीं थे। इसलिए कारीगरों ने यह काम बंद कर दिया। शकील अहमद बताते हैं कि पहले यहां मोम के द्वारा फूल के बर्तनों की ढलाई होती थी, लेकिन पूंजी कम होने कारण अब यह काम यहां बंद हो गया। फूल के बर्तनों के व्यवसायी अमर सिंह कसेरा ने बताया कि लगभग सौ वर्ष से यहां फूल के बर्तनों की ढलाई होती थी। इसमें गगरा, बटुला, खंखरा आदि शामिल थे। यहां फूल बर्तन बनाने वाले 300 कारीगर रहते थे। मजदूरी कम मिलने के कारण सब धीरे-धीरे दूसरे स्थानों पर चले गए।