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नए वित्तीय साल में बनेंगे दस हजार मकान

Fri, 25 Mar 2016 11:21 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, गोंडा
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पहली बार ग्रामीण इलाकों में प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत हर साल दस हजार लोगों को आवास मिलने जा रहा है। इसे लेकर गरीबों में उत्साह है। कारण इसकी लागत एक लाख बीस हजार रुपये है। अभी तक इंदिरा आवास की लागत 70 हजार रुपये ही थी।
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इस योजना को लागू कराने में 2011 में हुई आर्थिक गणना की गड़बड़ी पात्रों के चयन में एक बड़ी समस्या आएगी। कारण सर्वे व फीडिंग में भारी पैमाने पर गड़बड़ी हुई है। प्रूफ रीडिंग नहीं हुई थी। इससे पहले डॉ. अंबेडकर ग्राम विकास व डॉ. लोहिया समग्र विकास योजना में चयनित दो सौ से ज्यादा गांवों को आवास से संतृप्त किया जा चुका है।

वर्ष 2013-14 में इंदिरा आवास का लक्ष्य 5999 रहा, जबकि अनुसूचित जाति का लक्ष्य शून्य कर दिया गया था। वर्ष 2014-15 में अनुसूचित जाति का लक्ष्य उनके बच्चों को शामिल कर 10770 आवास कर दिया गया।
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वर्ष 2015-16 में 9147 आवास का लक्ष्य जिले को मिला जो कम था। इससे बीपीएल सूची के करीब बीस हजार लोग आवास से वंचित रह गए। लोहिया आवास का लक्ष्य 1017 रहा, जो बहुत सीमित रहा। इसमें पात्रता की अनदेखी भी की गई। कई गांवों में लोहिया आवास की सूची में हेराफेरी भी हुुई।

वर्ष 2002 में बीपीएल सूची बनी, जिसमें कई नाम गलत रहे तो कई अपात्रों के नाम शामिल हो गए, लेकिन इसे सही कराने में शासन असफल रहा। इसे सही कराने का प्रयास मायावती सरकार ने किया था, लेकिन भारत सरकार ने इस पर रोक लगा दी।

बीपीएल सूची में अनुसूचित जाति के जिन लोगों का नाम है, उन्हें आवास मिल चुका है। उनके बाद बेटों को आवास दिया जा रहा है, जबकि पिछड़े, सामान्य व अल्पसंख्यक बीपीएल सभी गरीबों को आवास नहीं मिल पाया।

आवास के मामले में डॉ. अंबेडकर ग्राम विकास में चयनित गांवों को मायावती सरकार में लाभ मिला और इस सपा सरकार में लोहिया समग्र गांवों को आवास का पूरा लाभ मिल रहा है, लेकिन आठ सौ गांव ऐसे हैं, जो अभी तक किसी योजना में नहीं लिए गए।

यहां पर गरीबों को आवास मिल पाना टेढ़ी खीर है। यहां के गरीब दो दशक से छप्पर में रहने को विवश हैं और इनके यहां प्रधान चाह कर गरीब का आवास नहीं दिलवा पा रहे हैं। अधिकारियों की प्राथमिकता में समग्र गांव हैं और बाकी गांव से उनका कोई सरोकार नहीं है।


इनसेट
दो लाख लोगों को चाहिए आशियाना
जिले में गैर अंबेडकर व गैर लोहिया गांव को छोड़ दिया जाए तो दो लाख लोगों को एक कमरे का आवास चाहिए। इनमें से अधिकांश विधवा, विकलांग व बीमार लोग शामिल हैं, जो किसी तरह अपनी जीविका चला रहे हैं। आवास दिलाने में सबसे ज्यादा समस्या बढ़ती आबादी है, जिसे रोके बगैर सभी का आवास का सपना पूरा होना मुमकिन नहीं दिख रहा है।

वर्ष 2011 में पुन: बनाई गई सूची में करीब दो लाख परिवार हैं, जिन्हें आवास दिया जाना है। जिले की आबादी व क्षेत्रफल के अनुसार प्रधानमंत्री आवास योजना में हर साल दस हजार आवास मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। सूखाग्रस्त जिले में शामिल होने से आवास की संख्या बढ़ सकती है। नये सर्वे में किसी जिले में गरीबों की संख्या यहां से ज्यादा होने पर आवास की कुछ संख्या घट सकती है।
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