करनैलगंज। करीब 49 साल पुराने चर्चित हरिहर शरण हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से तीन बुजुर्गों को बड़ी राहत मिली है। सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए तीनों आरोपियों को बरी कर दिया।
करीब पांच दशक तक चले इस मुकदमे ने आरोपियों और उनके परिवारों की जिंदगी बदल दी। किसी को मुकदमे की पैरवी के लिए खेत और मवेशी बेचने पड़े, किसी ने 14 साल से अधिक समय जेल में बिताया, तो किसी का परिवार अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते आर्थिक और सामाजिक रूप से टूट गया। फैसले के बाद तीनों ने कहा कि उन्हें इंसाफ तो मिल गया, लेकिन जिंदगी के 49 साल वापस नहीं मिल सकते।
यह मामला 27-28 जून 1977 की रात करनैलगंज थाना क्षेत्र के कंचनापुर गांव के पास बसेरिया निवासी हरिहर शरण की हत्या से जुड़ा है। इस मामले में बसेरिया के सूबेदार दूबे और देव प्रसाद दूबे तथा लालेमऊ गांव के हीरालाल, राजबख्श, राजकिशोर और रामधनी के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया था।
वर्ष 1981 में गोंडा की अदालत ने सभी छह आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में 2011 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इस दौरान देव प्रसाद दूबे, राजकिशोर और रामधनी की मृत्यु हो गई।
15 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस जांच में गंभीर खामियां पाईं। इसके बाद ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए हीरालाल, राजबख्श और सूबेदार दूबे को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
चार बीघा खेत और मवेशी बेचने पड़े : सूबेदार
करीब 75 वर्षीय सूबेदार बताते हैं कि घटना के समय वे नाबालिग थे, लेकिन दुश्मनी के चलते मुकदमे में फंसा दिए गए। मुकदमे की पैरवी में चार बीघा खेती बिक गई, गाय-भैंस तक बेचनी पड़ी। चार बार में करीब एक वर्ष जेल में रहे। उनका कहना है कि पेशी छूटने के डर से कई बार बिना भोजन किए अदालत पहुंचना पड़ता था।
14 साल छह माह जेल में काटे : हीरालाल
77 वर्षीय हीरालाल के अनुसार उन्हें चार अलग-अलग अवधियों में करीब 14 वर्ष छह माह जेल में रहना पड़ा। उनका कहना है कि निर्दोष होते हुए भी सजा भुगतनी पड़ी। मुकदमे की वजह से परिवार आर्थिक रूप से बिखर गया और बच्चों की पढ़ाई व भविष्य प्रभावित हुआ।
पौने तीन साल जेल, अदालतों में गुजर गई उम्र : राजबख्श
75 वर्षीय राजबख्श बताते हैं कि करीब पौने तीन वर्ष जेल में रहे। मुकदमे की पैरवी में इतनी राशि खर्च हो गई कि यदि वही पैसा किसी व्यवसाय में लगाया होता तो परिवार की स्थिति आज अलग होती। उनका कहना है कि पूरी उम्र अदालतों और वकीलों के चक्कर लगाते निकल गई।
टाइमलाइन
27-28 जून 1977 : हरिहर शरण की हत्या
28 जून 1977 : करनैलगंज थाने में एफआईआर दर्ज
1981 : गोंडा की अदालत ने छह आरोपियों को उम्रकैद सुनाई
2011 : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखी
2026 : सुप्रीम कोर्ट ने तीन जीवित आरोपियों को बरी किया, तीन आरोपियों की सुनवाई के दौरान हो चुकी है मौत