अरबों रुपयों की वन संपदा की हिफाजत की जिम्मेदारी संभाल रहे वन विभाग में पहरेदारों का जबरदस्त अकाल चल रहा है। हालत यह है कि मंडल के चार जिलों में जहां क्षेत्रीय वन अधिकारी से लेकर फारेस्ट गार्ड और फारेस्टर के दर्जनों पद रिक्त चल रहे हैं तो वहीं इनका फायदा उठाकर वन माफिया एक के बाद एक जंगली और सामाजिक वानिकी क्षेत्र में लगे पेड़ों का सफाया करते जा रहे हैं।
इसके चलते जंगली क्षेत्र का दायरा मंडल के चार जिलों में दिनोंदिन सिकुड़ता जा रहा है। वहीं, वन विभाग की पूरी मशीनरी चाह कर भी इस पर अंकुश लगा पाने में नाकाम साबित होती दिखाई दे रही है।
मंडल के चार जिलों में गोंडा में 9, बहराइच में 6 तो बलरामपुर व श्रावस्ती में वन विभाग के अंतर्गत 5-5 रेंज आते हैं। लेकिन अगर इन रेंजों में बतौर क्षेत्रीय वन अधिकारी की तैनाती की बात की जाए तो गोंडा में 4, बहराइच में 2, बलरामपुर में 3 और श्रावस्ती में रेंजरों के दो पद कई महीनों से खाली चल रहे हैं।
इस कारण मजबूरी में वन विभाग को एक ही रेंजर से कई-कई वन रेंजों का काम लेना पड़ रहा है। इसके कारण जंगलों की निगरानी ठीक ढंग से नहीं हो पाती है, जिसका फायदा वन माफिया उठाते रहते हैं।
मंडल में वन संपदा की निगरानी करने वाले वन विभाग की पहरेदारी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस डीएफओ को शासन से चार महीने पहले कटान की शिकायत पर निलंबित कर दिया गया था।
उनकी जगह आज तक किसी स्थाई डीएफओ की पोस्टिंग वन विभाग के अधिकारी नहीं कर पाए हैं। इसके कारण इस पद का प्रभार बलरामपुर के एसीएफ (सहायक वन संरक्षक) अंकेश श्रीवास्तव को देखना पड़ रहा है।
जंगलों की निगरानी का जिम्मा मुख्य तौर पर फारेस्ट गार्ड और फारेस्टर पर होता हैं। जो समय-समय पर जंगल का दौरा कर यह पता लगाते रहते हैं कि कहीं पेड़ों की अवैध कटान तो नहीं हो रही। लेकिन जब विभाग में पहले से ही 50 फारेस्ट गार्ड और 30 से ज्यादा फारेस्टर के पद खाली चल रहे हो तो इसकी सुरक्षा का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
मंडल के चार जिलों में वन विभाग की संपदा करीब 50 हजार हेक्टेयर भूमि पर फैली हुई है। जिस पर तरह-तरह के बेशकीमती पेड़-पौधे लगे हुए हैं। जो हमें सिर्फ प्राण वायु ही नहीं देते, बल्कि पर्यावरण को भी साफ-सुथरा रखने में हमारी मदद करते हैं। इसके बावजूद इस वन संपदा की हिफाजत सभी चार जिलों में रामभरोसे हो रही है।
विभाग के पास न तो पर्याप्त संख्या में मैन पावर है और न ही संसाधन। लेकिन जब बात कहीं किसी रेंज में कटान की आती है तो इसकी सीधी गाज संबंधित क्षेत्र के जिम्मेदार पर गिरा दी जाती है। फिर चाहे संबंधित क्षेत्र में किसी रेंजर, फारेस्ट गार्ड या फारेस्टर की पोस्टिंग भी न हो।
बीते चार साल में तीन बार इसकी पुनरावृत्ति अवैध कटान और आरा मशीन के प्रकरण को लेकर हो चुकी है, जिसमें डीएफओ से लेकर रेंजर और तमाम फारेस्ट गार्ड व फारेस्टर को निलंबित किया गया।
मंडल के चार जिलों में फैली वन संपदा, आरा मशीन व अवैध कटान के प्रकरणों से हर साल सरकार को करीब 50 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। इसके बावजूद इस वन संपदा की निगरानी वन विभाग ठीक तरह से नहीं कर पा रहा।
हर साल तकरीबन 30 करोड़ रुपये के राजस्व की प्राप्ति सरकार को गोंडा वन प्रभाग से होती है, जबकि 12 करोड़ रुपये बहराइच, 8 करोड़ रुपये बलरामपुर व श्रावस्ती जनपद से सरकार के खाते में जाते हैं।