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ग्रामीण क्षेत्रों में कैश की किल्लत बरकरार

Tue, 27 Dec 2016 11:40 PM IST
अमर उजाला/गोंडा
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कैश की समस्या से परेशान परिवार - फोटो : अमर उजाला
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नोटबंदी के मंगलवार को 50 दिन पूरे हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैश किल्लत से जूझ रहे लोगों से हालात सामान्य करने के लिए यह अवधि मांगी थी। यह मियाद भी पूरी हो गई, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं।
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हालांकि शहर के बैंकों व एटीएम पर लगने वाली भीड़ कम हुई है, लेकिन गांवों में स्थिति जस की तस है। नोटबंदी के आदेश के बाद कैश किल्लत से जूझ रही जनता से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हालात सामान्य करने के लिए 50 दिन का समय मांगा था। यह मियाद मंगलवार को पूरी हो गई।

केंद्र सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में कैश किल्लत बरकरार है। हालांकि शहर के बैंकों व एटीएम पर लगने वाली भीड़ में काफी कमी आई है जबकि यहां आज भी रुपये निकालने के लिए लोगों को दिन भर लाइन लगानी पड़ रही है। उधर, मंगलवार को शहर के एनआईसी सभागार में जनसेवा केंद्रो के संचालकों द्वारा जागरूकता रैली निकाली गई जिसे जिलाधिकारी आशुतोष निरंजन ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।        
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शहर में मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले शिक्षक इरफान का कहना है कि नोटबंदी के वह 50 दिन उनका परिवार जीवन भर नहीं भूलेगा। हालात ऐसे हो गए थे कि उन्हें अपने दोनों बेटों की फीस जमा करने के लिए पड़ोसी से पांच हजार रुपये उधार लेने पड़े। उनकी पत्नी कहती हैं कि घर के खर्च भी काफी कटौती कर उसे आधा करना पड़ा। यही नहीं उनके मामा के घर लड़के की शादी थी, जिसमें उनका परिवार ने रिश्तेदार के घर तक पहुंचने में पूरे दिन मुंह बांध कर सफर किया। नोट बंदी के चलते रुपया होने के बावजूद अपने बच्चों को रास्ते भर कुछ नहीं खिला सके।       

शहर के पटेलनगर निवासी शबनम कहती हैं कि उसके पति ठेला लगाते हैं, जिससे किसी तरह घर का खर्च चल पाता है। नोटबंदी के दौरान उनकी कमाई आधी हो गई जिससे घर का खर्च चलना मुश्किल हो गया। बिटिया सना, नेहा कहती हैं कि वे अमीर नहीं हैं, लेकिन उसे याद है जब कि अम्मी दिन भर बैंक में गंवाने के बाद कुछ रुपये निकाल पाई थी, जिससे उनकी उस दिन की दिहाड़ी बर्बाद हो गई थी।      
   
गोंडा में पटेल नगर निवासी 108 वर्षीय रसूलन जहां कहती हैं कि ऐसी परेशानी जीवन में नहीं दिखी। उनके पति रेलवे में मालबाबू थे, इसलिए सरकारी पेंशन निकालने जाना पड़ता है, लेकिन नोटबंदी के दौरान जो दुश्वारियां उनके परिवार को उठानी पड़ीं, वह जीवन भर याद रहेगा।       

शहर के रानी बाजार निवासी विजय अग्रवाल कहते हैं कि वह थोक गल्ले का व्यापार करते हैं जो पूरी तरह से नकदी से होता है। नोट बंदी के दौरान उनका व्यापार आधा हो गया। उधारी देने से मना करने पर संबंध बिगड़ने का डर रहता है, ऐसे में कई खास लोग को न चाहते हुए भी मना करना पड़ा।       
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