गोंडा। चिकित्सकों की लापरवाही के कारण नसबंदी के बाद भी कई महिलाएं गर्भवती हो चुकी हैं। विगत सत्र में नसबंदी फेल होने के सात दावे किए गए हैं। जांच के बाद महिलाओं को विभाग की ओर से 60 हजार रुपये मुआवजा दिया जाएगा।
11 जनवरी को नवाबगंज के एक गांव की निवासी महिला ने सीएचसी अधीक्षक से शिकायत करते हुए बताया था कि उसके पहले तीन बच्चे हैं। गरीबी के चलते परिवार का पोषण करने में समस्या हो रही थी। इसलिए सीएचसी पर लगे शिविर में नसबंदी करवा ली थी। खुश थी कि अब संतान नहीं होगी लेकिन अल्ट्रासाउंड कराने पर गर्भवती होने की पुष्टि हुई। अब अनचाही संतान को जन्म देना पड़ेगा। इसी प्रकार वर्ष 2024 में सात महिलाओं ने नसबंदी के बाद गर्भवती होने की शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने विभाग से मिलने वाले मुआवजे का दावा किया।
एनएचएम के जरिये होता भुगतान
नसबंदी फेल होने पर महिलाओं को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 60 हजार रुपये का मुआवजा दिया जाता है। सीएमओ कार्यालय के सहायक शोध अधिकारी अरुण कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि यदि नसबंदी के नौ महीने के बाद तक कोई महिला गर्भवती हो जाती है तो उसे गर्भधारण के 90 दिनों के भीतर सीएमओ कार्यालय पर दावा पेश करना होता है। नसबंदी के बाद इंफेक्शन होने पर 50 हजार रुपये दिया जाता है। यदि नसबंदी के एक महीने के भीतर महिला की मौत हो जाए तो आश्रित को दो लाख रुपये का भुगतान किया जाता है।
पांच सदस्यीय टीम ने शिविर में की थी नसबंदी
बालपुर (गोंडा)। हलधरमऊ सीएचसी में गर्भवती की नसबंदी किए जाने के आरोप के बाद स्वास्थ्य महकमे में खलबली मची हुई है। बुधवार को सुबह से ही सीएचसी पर नसबंदी की पत्रावली खंगाली जाने लगी। नसबंदी करने वाली पांच सदस्यीय टीम के बारे में जानकारी एकत्र की गई।
सीएचसी अधीक्षक डॉ. संत प्रताप वर्मा का दावा है कि 17 फरवरी को सीएचसी पर नसबंदी के लिए 22 महिलाओं ने पंजीकरण कराया था, जिसमें सभी की जांच हुई। छह महिलाएं गर्भवती पाई गईं। रूमा में गर्भावस्था की पुष्टि नहीं हुई। जबकि रूमा का दावा है कि उसकी गर्भावस्था की जांच नहीं हुई है। नसबंदी टीम में सर्जन डॉ. उदय प्रताप, काउंसलर राखी, एएनएम साक्षी व ज्योति रहीं। किसने जांच की, इसकी जानकारी जुटाई जा रही है।
एसीएमओ डॉ. जयगोविंद ने बताया कि गर्भवती की नसबंदी करने का मामला संज्ञान में आया है। बृहस्पतिवार को राज्यपाल का कार्यक्रम है। उसके बाद टीम गठित कर जांच कराई जाएगी।