अंजुमन तामीर-ए-अदब के तत्वाधान शनिवार की रात संस्था कार्यालय पर एक गैर तरही नशिस्त का आयोजन किया गया। नशिस्त में कवि व शायरों ने अपनी-अपनी रचनाएं पढ़कर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
नशिस्त का आगाज नात-ए-पाक से किया गया। शेरो-शायरी का आगाज करते हुए राज उतरौलवी ने शेर पढ़ा कि- लिखकर वह मेरे नाम फसाना चला गया, वह क्या गया कि सारा जमाना चला गया।
डॉ. अब्दुल सुबहान खां शाद ने शेर सुनाया कि- बजाये अश्क टपकता है खून आंखों से, अजीब रंग तेरे गम ने अख्तियार किया। उवैश मोनिस ने शेर पढ़ा कि- उस भीड़ का सबसे बड़ा नादार मैं ही था, फिर भी न फैले हाथ कि खुद्दार मैं ही था। डॉ. अब्दुल अजीज ने शेर सुनाया कि- खुरदरी राहों से होकर जब गुजरता है कोई, याद आ जाती है अपनी आबला पाई मुझे।
शादाब शब्बीरी ने फरमाया कि- दिल्ली के महलों में भटकता हूं शब व रोज, मैं मीर की गालिब की जवां ढूंढ़ रहा हूं। अनवर मुजतर ने शेर पढ़ा कि- जो हादसा हुआ है मेरी जिंदगी के साथ, वह हादसा खुदा न करे हो किसी के साथ।
हामिद बलरामपुरी ने शेर सुनाया कि- मैं मुफलिस हूं तो क्या दरकार माल व जर नहीं मुझको, अमीर-ए-शहर के आगे झुकाना सर नहीं मुझको। डॉ. एपी पांडेय ने नशिस्त की अध्यक्षता करते हुए शेर पढ़ा कि- शामें और भी हैं इंतजार और भी हैं, अभी वह रात कहां कि मुझे नींद आ जाए। नशिस्त में अब्दुल कादिर आजाद, डॉ. शमसुर्रहमान शम्स एवं आसिफ आदि ने भी अपनी रचनाएं पढ़ीं।