हेपेटाइटिस एक गंभीर बीमारी है। इससे हर साल जिले में सैकड़ों लोगों की मौत हो जाती है। जानकारों की मानें तो प्रत्येक 12 व्यक्तियों में एक व्यक्ति हेपेटाइटिस की बीमारी से ग्रसित होता है। बच्चों को इस बीमारी से बचाने के लिए पहले जहां हेपेटाइटिस बी का टीका लगाया जाता था तो वहीं अब सी का भी टीका लगने लगा है।
वहीं, बड़ों को भी इस बीमारी से बचाने के लिए टीके की व्यवस्था है। इसके बावजूद हेपेटाइटिस के शिकार लोगों की जान इस बीमारी के उपचार में देरी और जागरूकता के अभाव में चली जाती है। डॉक्टरों का कहना है कि इस रोग से बचाव का सबसे अच्छा तरीका इसके प्रति जानकारी व जागरूकता रखना है। भौतिकवादी युग में अनियमित खानपान भी इस रोग के बढ़ने का प्रमुख कारण बन गया है। पेश है रिपोर्ट-
हेपेटाइटिस लीवर को हानि पहुंचाने वाला एक खतरनाक रोग है। इससे शरीर की कोशिकाओं में सूजन आ जाती है और आगे चलकर यही पीलिया का रूप ले लेती है। इससे लीवर में घाव होने लगता है। छह महीने से अधिक इस बीमारी से पीड़ित मरीज को आगे चलकर लीवर सिरोसिस या फिर लीवर कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
इससे उसकी जान तक चली जाती है। हेपेटाइटिस की बीमारी मुख्यत: पांच प्रकार ए, बी, सी, डी व ई टाइप की होती है। इसका फौरी उपचार न होने पर यह बीमारी दीर्घकालिक होने के साथ पूरे लीवर को डैमेज कर देती है।
शरीर में दर्द, कमजोरी, भूख कम लगना, उल्टी, कब्ज, गहरे रंग की पेशाब आना, हल्के रंग का मल होना, बुखार, सिर दर्द, पेट दर्द, शरीर में पीलापन आ जाना, खुजली होना, जोड़ों में दर्द, खून की उल्टी, मलाशय से रक्त आना, वजन कम होना इसके लक्षण हैं।
दूषित इंजेक्शन के प्रयोग, शरीर पर गोदना, छेदना, गुर्दे की डायलिसिस, एक से ज्यादा व्यक्ति के साथ असुरक्षित संभोग, गर्भवती माता से शिशु में, शरीर के किसी अंग के प्रत्यारोपण से, दूषित भोजन व जल के सेवन आदि से हेपेटाइटिस होता है।
परहेज के जरिए हेपेटाइटिस से बचा जा सकता है। साथ ही इंटरफेरोन, राइबावोरिन, अमान्टिडिन नामक दवाइयां ही इस बीमारी के लिए बाजार में उपलब्ध हैं। जबकि संजीदा रोगियों के लिए इस बीमारी से बचने का एक मुख्य उपाय लीवर प्रत्यारोपण है।
जिले में पांच साल में एक भी बच्चे की मौत हेपेटाइटिस से नहीं हुई है। इसके लिए सीएचसी-पीएचसी से नियमित टीकाकरण अभियान के तहत बच्चों को हेपेटाइटिस बी व सी के टीके लगाए जा रहे हैं। बड़ों की मौत के बारे में वह इसलिए नहीं बता सकते, क्योंकि इसकी कोई डिटेल उनके पास नहीं है। -डॉ. अमर सिंह कुशवाहा, सीएमओ गोंडा
जिले में हेपेटाइटिस से पांच साल में कितनी मौतें हुई हैं, इसका कोई रिकॉर्ड उनके पास नहीं है। क्योंकि हेपेटाइटिस से पीड़ित लीवर सिरोसिस या फिर लीवर कैंसर के मरीज जैसे ही यहां आते हैं, उन्हें उपचार के लिए हायर सेंटर जैसे राममनोहर लोहिया, मेडिकल कॉलेज, पीजीआई रेफर कर दिया जाता है। इसलिए इससे संबंधित मौतों का कोई रिकॉर्ड विभाग के पास नहीं रहता है। -डॉ. आशुतोष गुप्त, सीएमएस जिला अस्पताल गोंडा