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Gonda News: अपने दम पर मुकाम हासिल कर मिसाल बनीं मंजू

Thu, 26 Jun 2025 11:31 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
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नर्सरी वि​धि से गन्ने की उन्नत खेती के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त करतीं मंजू देवी। फाइल
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गोंडा। खेती-किसानी में नवाचार कर लाखों रुपये कमाए जा सकते हैं। यह कर दिखाया तरबगंज के करनीपुर गांव की रहने वाली किसान मंजू पांडेय ने। जिले में हो रही गन्ने की परंपरागत खेती से इतर उन्होंने गन्ने की नर्सरी तैयार कर बेचना शुरू कर दिया। बीते वर्ष उनके समूह की नर्सरी से पांच लाख के पौधों की बिक्री हुई। जिससे समूह को करीब तीन लाख रुपये की आमदनी हुई। उन्नत खेती के लिए मंजू को दो बार राज्य स्तरीय पुरस्कार जीत चुकी हैं।
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तरबगंज के करनीपुर में प्रेरणा स्वयं सहायता समूह बीते पांच वर्षों से कृषि आधारित प्रयास कर रहा है। समूह की अध्यक्ष मंजू देवी ने बताया कि वर्ष 2020 में कोरोना संकट का दौर चल रहा था, प्रवासी मजदूर गांव आकर बेरोजगार हो गए थे। लोगों की समस्या को देखते हुए उन्होंने स्वयं सहायता समूह बनाकर महिलाओं को रोजगार देने का प्रयास किया।
तत्कालीन जिला गन्ना अधिकारी ओपी सिंह की प्रेरणा से गन्ने की नर्सरी तैयार करने की सोची। समूह की ओर से शाहजहांपुर से सीओएस 13235 के उच्च गुणवत्ता वाले बीज मंगाए गए। इसके बाद नर्सरी तैयारी की गई। 2020 के सितंबर-नवंबर में नर्सरी में कुल 1.59 लाख गन्ने के पौधे तैयार किए गए थे। धीरे-धीरे मांग बढ़ती गई और बीते वर्ष पांच लाख पौधों की बिक्री हुई थी। इस वर्ष छह लाख पौधे तैयार करने का लक्ष्य है। मंजू देवी ने बताया कि वर्ष 2021 व 2022 में उन्हें लगातार दो बार राज्य स्तरीय पुरस्कार मिल चुका है।
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12 महिलाओं को मिला रोजगार
प्रेरणा स्वयं सहायता समूह में मंजू समेत 12 महिलाएं काम कर रही हैं। नर्सरी तैयार करने के लिए खाद व वर्मी कंपोस्ट भी स्वयं सहायता समूह की ओर से तैयार किया जाता है। प्रत्येक महिला सदस्य हर सीजन में गाय के गोबर से 200 से 300 बैग वर्मीकंपोस्ट तैयार करती है। नर्सरी तैयार करने में 45 दिन लगते हैं। सबसे पहले बड कटर मशीन से गन्ने की गांठ काटी जाती हैं। फिर इन्हें रसायन के घोल में डालकर शोधन किया जाता है। फिर एक-एक भाग वर्मीकंपोस्ट, बालू, कोकोपिट भरा जाता है। इनमें गन्ने की गांठ को गहराई में लगा दिया जाता है। फिर इन पोरट्रे को एक-दूसरे के ऊपर रखकर पॉलिथिन से ढंक दिया जाता है। एक हफ्ते के बाद इन गांठों में कल्ले फूट जाते हैं। यह नर्सरी किसानों को एक रुपये 30 पैसे के हिसाब से बेची जाती है।
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