घर में खाने का एक दाना न हो और साल भर बगैर राशन के ही खाना बनता रहा हो, तो यह बात हर किसी को चौंका सकती है। बलरामपुर स्वास्थ्य विभाग के एक ऐसे ही घालमेल का खुलासा ऑडिट टीम ने किया है। इसमें साल भर तक सीएचसी के रसोइए को 17800 रुपये की दर से वेतन का भुगतान करने का सवाल उठाते हुए ऑडिट टीम ने सीएमओ से इसका जवाब मांगा है। वह भी उन परिस्थितियों में जबकि डाइट के मद में निदेशालय से सीएचसी को कोई बजट ही अलाट नहीं किया गया।
स्वास्थ्य विभाग ने हर सीएचसी-पीएचसी में डिलीवरी को भर्ती होने वाली महिलाओं के लिए यह व्यवस्था बना रखी है कि अगर कोई प्रसूता सीएचसी-पीएचसी में भर्ती हो तो उसे उचित डाइट मसलन फल, अंडा, दूध के अलावा दोनों टाइम भरपूर आहार (भोजन) उपलब्ध कराया जाए।
इसके लिए निदेशालय से हर महीने इसका बजट प्रत्येक सीएचसी-पीएचसी को आवंटित किया जाता है। लेकिन बलरामपुर स्थित सीएचसी पचपेड़वा का जो मामला ऑडिट टीम की पकड़ में आया है, उसके लिए निदेशालय से कोई बजट ही आवंटित नहीं है।
इसके बावजूद सीएचसी में तैनात रसोइए को हर महीने वेतन के मद में 17800 रुपये की दर से साल भर तक 2.13 लाख रुपये का भुगतान किया जाता रहा।
यही नहीं अपनी रिपोर्ट में ऑडिट ने सीएचसी की रसोई के भी बंद रहने का जिक्र किया है।
अक्तूबर 2013 से शासन ने यह व्यवस्था कर रखी है कि अगर संविदा के आधार पर किसी चीज की खरीददारी या बिक्री की जाती है तो तो 4 प्रतिशत की दर से टैक्स संबंधित विभाग में जमा करना होगा।
लेकिन बलरामपुर जिले में मै. डैफोडिल्स फार्मा जवाहरनगर मेरठ से बिल संख्या सी-84 के तहत क्रय की गई पौने चार लाख रुपये की दवाओं के बिल से किसी तरह की कोई कटौती टीडीएस के मद में नहीं की गई और कंपनी को अधिक का भुगतान कर दिया गया।
स्वास्थ्य विभाग का अगर कोई कर्मी परिवार नियोजन का ख्याल रखते हुए अपने परिवार को सीमित रखता है, तो इसके लिए स्वास्थ्य महकमे की ओर से उस कर्मी को प्रोत्साहन राशि दी जाती है। जिसका अंकन संबंधित कर्मी की सेवा पुस्तिका में होना जरूरी होता है।
लेकिन बलरामपुर में चिकित्साधिकारी डॉ. आरसी गुप्ता को जो 750 रुपये प्रतिमाह बतौर प्रोत्साहन के उन्हें दिया जाता रहा। उसका उनकी सेवा पुस्तिका में कोई अंकन ही नहीं है। न ही उन्हें यह प्रोत्साहन राशि देने के लिए किसी सक्षम अधिकारी की तरफ से आदेश ही दिया गया है।