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आजाद के डर से दो दिन पहले दे दी थी लाहिड़ी को फांसी

Wed, 16 Dec 2015 10:48 PM IST
गोंडा/अमर उजाला ब्यूरो
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मैं हिंन्दू होने के नाते पुनर्जन्म में आस्था रखता हूं। इसलिए मैं मरने नहीं, वरन् आजाद भारत में फिर से जन्म लेने के लिए जा रहा हूं।’ यह उद्गार काकोरी ट्रेन लूटकांड के नायक अमर शहीद राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी ने गोंडा जेल में 17 दिसंबर 1927 को अपनी फांसी से कुछ समय पूर्व तत्कालीन जेलर से व्यक्त किए थे।
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उनके व्यक्त किए विचार को हर कोई मानता है और लाहिड़ी जैसा ही बलिदानी बनने की बात होती है। पर प्रशासनिक व राजनीतिक उपेक्षा के कारण यहां अमर शहीद के बलिदान की निशानी दुर्दशा का शिकार है। उनकी याद में गोंडा कचहरी रेलवे स्टेशन का नाम रखने की मांग भी काफी पुरानी है, किंतु केंद्र सरकार को अमर शहीदों की यादगार को संजोने के लिए कुछ करने की फुरसत नहीं है।

अमर शहीद राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी का जन्म 23 जून 1901 को वर्तमान बांग्ला देश के पावना जिला के मोहनपुर गांव में क्षितिज मोहन लाहिड़ी व श्रीमती बसंतकुमारी के घर हुआ था। उनके जन्म के समय पिता व बड़े भाई बंगाल में चल रही अनुशीलन दल की गुप्त गतिविधियों में योगदान देने के आरोप में कारावास की सलाखों के पीछे कैद थे। परिस्थितियों के कारण मात्र नौ वर्ष की आयु में ही वह बंगाल से अपने मामा के घर वाराणसी आ गए।
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वाराणसी में ही उनकी शिक्षा दीक्षा सम्पन्न हुई। काकोरी कांड के दौरान लाहिड़ी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में इतिहास विषय में एमए (प्रथम वर्ष) के छात्र थे। उन दिनों वाराणसी क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। यहीं पर उनकी भेंट प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचींद्र सान्याल से हुई। वह रिपब्लिकन पार्टी के सक्रिय सदस्य बन गए और कई आंदोलनों में अहम भूमिका निभाई।

अंग्रेजी हुकूमत से लड़ने के लिए ब्रिटिश माउजर खरीदने के वास्ते पैसे का प्रबंध करने के लिए पं. राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, अशफाक उल्ला खां के साथ मिलकर राजेन्द्र लाहिड़ी ने अपने छह अन्य सहयोगियों के साथ 9 अगस्त 1925 की शाम सहारनपुर से चलकर लखनऊ पहुंचने वाली 08 डाउन ट्रेन पर धावा बोल दिया और सरकारी खजाना लूट लिया। मजे की बात यह कि उसी ट्रेन में सफर कर रहे अंग्रेज सैनिकों तक की हिम्मत न हुई कि वे मुकाबला करने को आगे आते।

काकोरी कांड के बाद बिस्मिल ने लाहिड़ी को बम बनाने का प्रशिक्षण लेने के लिए बंगाल भेज दिया। राजेन्द्र लाहिड़ी कलकत्ता गए और वहां से कुछ दूर स्थित दक्षिणेश्वर में उन्होंने बम बनाने का सामान इकट्ठा किया। अभी वे पूरी तरह से प्रशिक्षित भी न हो पाए थे कि किसी साथी की असावधानी से एक बम फट गया और बम का धमाका सुनकर पुलिस आ गई। कुल नौ साथियों के साथ राजेन्द्र लाहिड़ी भी गिरफ्तार हो गए।

उन पर मुकदमा दायर किया और 10 वर्ष की सजा हुई जो अपील करने पर सजा पांच वर्ष कर दी गई। बाद में ब्रिटिश राज ने दल के सभी प्रमुख क्रांतिकारियों पर काकोरी कांड के नाम से मुकदमा दायर करते हुए सभी पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने तथा खजाना लूटने का मुकदमा चलाया।

तमाम अपीलों व दलीलों के बावजूद सरकार टस से मस न हुई और अंतत: लखनऊ के वर्तमान जीपीओ पार्क हजरत गंज में अंग्रेज जज हेल्टन द्वारा चार क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई गई। अंग्रेजी हुकूमत द्वारा सभी क्रांतिवीरों को प्रदेश के अलग-अलग जेलों में रखा गया। राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी को गोंडा जेल भेजा गया।

सभी क्रांतिकारियों की फांसी के लिए 19 दिसंबर 1927 की तारीख तय की गई थी लेकिन इस महान क्रांतिकारी को जेल से जबरन छुड़ाकर ले जाने के लिए चंद्रशेखर आजाद के गोंडा में आकर कहीं छुप जाने की खुफिया सूचना पर तत्कालीन हुकूमत ने उन्हें नियत तिथि से दो दिन पूर्व ही 17 दिसंबर 1927 को फांसी पर लटका दिया। इनका अंतिम संस्कार जेल से 500 मीटर दूर स्थित टेढ़ी नदी के बूचड़ घाट पर किया गया। यहां उनकी समाधि बनी हुई है।

फांसी के दिन भी सुबह-सुबह लाहिड़ी व्यायाम कर रहे थे। जेलर ने पूछा कि मरने के पहले व्यायाम का क्या प्रयोजन है? लाहिड़ी ने निर्वेद भाव से उत्तर दिया, ‘जेलर साहब! मैं हिंदू हूं और पुनर्जन्म में मेरी अटूट आस्था है। अत: अगले जन्म में मैं स्वस्थ शरीर के साथ ही पैदा होना चाहता हूं ताकि अपने अधूरे कार्यों को पूरा कर देश को स्वतंत्र करा सकूं। इसीलिए मैं रोज सुबह व्यायाम करता हूं। आज मेरे जीवन का सर्वाधिक गौरवशाली दिवस है तो यह क्रम मैं कैसे तोड़ सकता हूँ?’ यज्ञ स्थल पर लाहिड़ी द्वारा जेलर को दिया गया अंतिम संदेश एक शिलापट्ट पर अंकित है।

बलिदान दिवस पर होंगे विभिन्न आयोजन
जिलाधिकारी अजय कुमार उपाध्याय ने बताया कि अमर शहीद लाहिड़ी के 89वें बलिदान दिवस पर गुरुवार को जेल परिसर स्थित शहीद स्थल व बूचड़ घाट पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। समाजसेवी धर्मवीर आर्य के नेतृत्व में कई अन्य कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं। इस अमर शहीद की याद में हर वर्ष 17 दिसंबर को यहां कारागार परिसर में हवन पूजन होता है तथा प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि तथा विभिन्न संगठनों के लोग उनकी समाधि व प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करते हैं।

नहीं हो सका प्रेरणा पार्क का सुंदरीकरण
समय समय पर समाधि स्थल परिसर की चहारदीवारी बनवाने के साथ ही उनके नाम पर बने प्रेरणा पार्क के सुंदरीकरण की मांग होती रही लेकिन इस पर अमल कभी नहीं हुआ। प्रेरणा पार्क में न तो फूल है और न माली। समाधि स्थल व प्रेरणा पार्क, जहां फूलों की क्यारियां होनी चाहिए वहां जंगली घासें उगी हैं और मवेशियों का जमावड़ा रहता है। किसी शायर द्वारा कही गई पंक्तियां ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा’ गोंडा में प्रशासनिक व राजनीतिक उपेक्षा के कारण बिल्कुल निरर्थक हैं।
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