लघु प्रयाग के नाम से विख्यात पौराणिक स्थल सूकरखेत पसका में कल्पवासियों की आमद शुरू हो चुकी है। भीषण ठंड में लगातार एक महीने तक यहां अपने परिवार से दूर रहकर कल्पवास करेंगे और सांसारिक मोहमाया से विरक्त रहकर भगवान के नाम का गुणगान करेंगे। त्रिमुहानी घाट के किनारे लाइन से बनी झोपड़ियां यह बताने को काफी हैं कि जिस परंपरा की शुरुआत कल्पवासियों ने आज से कई सौ साल पहले की थी, वह आज भी जीवंत है।
चाहे जितनी भी ठंड या शीतलहरी क्यों न हो कल्पवासियों की आस्था न तो पहले कभी डिगी थी, न ही आज डिग पाई है।
दूर-दूर तक बिना किसी सहूलियत के एकांत स्थान पर झोपड़ी बनाकर उसमें रहना और दिन भर भगवान के नाम का गुणगान करना ही कल्पवासियों का एकमात्र उद्देश्य रहता है।
यहां कल्पवासी एक महीने तक अनवरत ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सरयू नदी में स्नान करते हैं। इसके बाद इनके पूजन-अर्चन और भजन-कीर्तन का सिलसिला पूरी रात चला करता है।
25 दिसंबर को पौष पूर्णिमा के मुख्य स्नान के बाद कल्पवासी अपने-अपने घरों के लिए कूच कर जाएंगे। लेकिन इस बीच एक महीने का समय उनके लिए किसी तपस्या से कम नहीं है।
कल्पवासी त्रिमुहानी घाट पर कीर्तन-भजन के साथ संगत का आनंद प्राप्त करते हैं। एक महीने तक पसका में सरयू नदी के किनारे क्षेत्र के लोगों की ओर से यहां अलग-अलग तरह के आयोजन भी किए जाते हैं।
भागवत पाठ से लेकर सुंदर कांड और न जाने कितने तरह के आयोजन यहां एक महीने तक होते हैं। श्रीरामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास की जन्मस्थली सूकरखेत कई विशेषताओं से भरी है।
धार्मिक क्रियाकलापों के लिए यहां दूर-दूर से आकर लोग अनुष्ठान करते हैं। भंडारे से लेकर धार्मिक आयोजनों का यह क्षेत्र शुरू से ही गढ़ रहा है।
पसका सूकरखेत वही जगह है जहां हिरण्यकश्यप के भाई हिरण्याक्ष का भगवान विष्णु ने सूकर का रूप धारण कर वध किया था। यहां पौराणिक काल से भगवान वाराह का एक मंदिर भी बना है। मान्यता है कि सच्चे मन से मंदिर में मत्था टेकने से व्यक्ति की हर एक मुराद पूरी होती है।
धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण पसका घाघरा और सरयू दो पवित्र नदियों का संगम स्थल रहा है। वर्षों से इस स्थान पर स्नान-दान कर पुण्य लाभ अर्जित किए जाने की परंपरा भी चली आ रही है। हालांकि अब संगम वाले स्थान पर बांध बना दिए जाने से इसका अस्तित्व समाप्त हो गया है।