गोंडा। ...जेल तोड़कर कारसेवकों बाहर निकलो, सरयू की जलधारा तुम्हें पुकार रही। ... कब तक हम जेलों में रहकर, अखबारों में खबरें पढ़कर। ये पंक्तियां एलबीएस पीजी कॉलेज हिंंदी विभाग विभागाध्यक्ष डॉ. शैलेंद्रनाथ मिश्र ने शाहजहांपुर के खाद्य निगम गोदाम में बनी अस्थाई जेल में बंद रहने के दौरान रची थीं।
इसके बाद राम जन्मभूमि आंदोलन में कारसेवकों के साथ कविताओं से आंदोलन को धार दी। जेल में निरुद्ध रहने के दौरान डॉ. मिश्र ने जेलर की ओर से दी गई रिहाई वाली राय को ठुकरा दिया था। वह 15 दिनों तक कारसेवकों के कारागार में रहे। इसी दौरान रचनाओं से कारसेवकों में जोश भरा था।
साल 1989 में लखनऊ विश्वविद्यालय के हाॅस्टल मोतीमहल में रहकर डॉ. शैलेंद्रनाथ मिश्र हिंदी में पीएचडी कर रहे थे। बताते हैं कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने बयान दिया था कि अयोध्या में परिंदा तक पर नहीं मार सकता।
वहीं, विश्व हिंदू परिषद के आह्वान पर राममंदिर आंदोलन हिंदू बनाम मुस्लिम हो चला। ऐसे में गैर राजनीतिक होने के बावजूद वे लखनऊ से अयोध्या के लिए रवाना हो गए, लेकिन गोमतीनगर में बतौर जेआरएफ एसोसिएशन प्रेसीडेंट पुलिस ने 80 स्कॉलर के समूह को हिरासत में ले लिया। इसके बाद देरशाम पुलिस लाइन ले जाकर छोड़ दिया। दूसरे दिन दोबारा निकले तो हलवासिया के पास से रैपिड रैक्शन फोर्स ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
हजरतगंज थाने से पहले सीतापुर जेल ले गई, जहां जगह न होने के बाद शाहजहांपुर गए। जेल में जगह नहीं मिली तो खाद्य निगम के गोदाम में बनी अस्थायी जेल में दो बसों में पकड़े गए रामभक्तों को ले जाया गया था। यहां 998 रामभक्तों को कैद रखा गया था। तत्कालीन बरेली एमपी संतोष गंगवार, पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह और विधायक श्याम बिहारी मिश्र इसी अस्थाई जेल में कैद किए गए थे। आंदोलन अपने चरम पर था। 15 दिन जेल में बिताए।
जेल में खाने के नहीं थे इंतजाम, की थी भूख हड़ताल
डॉ. शैलेंद्र बताते हैं कि जेल में खाने के लिए इंतजाम नहीं थे। ऐसे में साथियों के साथ भूख हड़ताल शुरू कर दी। ऐसे में जेलर, संतोष गंगवार, राजवीर सिंह व श्यामबिहारी मिश्र समझाने के लिए पहुंचे। जेलर ने शर्त रखी कि अगर कारसेवकों में नहीं हैं तो उन्हें रिहा कर दिया जाएगा। लेकिन डॉ. मिश्र ने खुद को कारसेवक ही बताया और रिहाई से इन्कार कर दिया। ...बच्चों के छोटे बच्चों के हाथों में त्रिशूल रहने दो, पढ़कर हम जैसे बनने दो.. की रचनाओं के बाद कारसेवकों की शाखाओं में भाग लेने लगे। इसके बाद रचनाओं की झड़ी लगा दी। जेल की दीवारों पर कविताओं की पंक्तियां लिखीं।
राजनीतिक परिवार से रखते हैं ताल्लुक, बनाई थी दूरी
बताते हैं कि हिंदी विभाग विभागाध्यक्ष डॉ. शैलेंद्रनाथ मिश्र के पितामह पं. अमृतलाल मिश्र वर्तमान गौरा (पूर्व नाम- उतरौला-दक्षिणी) विधानसभा से 1952 में पहली बार विधायक चुने गए थे। उनके चाचा पं. देवेंद्रनाथ मिश्र मनकापुर विधानसभा सीट में 1971 से 75 तक कांग्रेस से विधायक रह चुके हैं। बावजूद इसके देवेंद्रनाथ मिश्र ने छात्र व शिक्षक जीवन में राजनीति से दूर रहने का संकल्प लिया था। लेकिन श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन में लखनऊ के मोतीमहल छात्रावास से ही बिगुल फूंका था।