गोंडा। हिंदी हैं हम वतन हैं, हिंदोस्तां हमारा... गीत आज भी गूंज रहा है। अमर उजाला की ‘हिंदी हैं हम’ मुहिम से जुड़े शिक्षकों ने हुंकार भरी। शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर कहा कि हिंदी राष्ट्र को एक सूत्र में बांधे है और सबको नई पहचान देने का काम कर रही है। शिक्षकों ने कहा कि हमें गर्व है कि हिंदी हमारे रोम-रोम में बसी है। आज उन्हें जो मुकाम हासिल हुआ है वह हिंदी भाषा की देन है।
राष्ट्रभाषा हिंदी को हम सभी मातृभाषा कहते हैं क्योंकि हमारे जीवन का आधार हिंदी है। राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी रचनाओं, लेखन और शोधों से आज अलग पहचान बना चुके शिक्षकों ने हिंदी के लिए हर दिन कार्य करने का संकल्प लिया। शिक्षकों ने हिंदी के लिए अमर उजाला के अभियान को सराहा और कहा कि आज अवसर मिला है कि हर किसी को वह हिंदी के माहात्म्य को जाने और हिंदी के लिए कुछ करने के लिए कदम आगे बढ़ाएं।
भाषा का सीधा संबंध संस्कार और सभ्यता से है
दिल्ली विश्वविद्यालय से भाषा सहोदरी हिंदी सम्मान से तीन बार सम्मानित शिक्षिका डॉ. शालिनी शुक्ला ने अमर उजाला के अभियान की सराहना करते हुए कहा कि हिंदी भाषा का सीधा संबंध संस्कार और सभ्यता से है। विश्व में जितने भी देश अग्रणी हैं, वे अपनी भाषा की वजह से ही हैं।
यदि हमें भारत को विश्व में सिरमौर बनाना है, हिंदी को मजबूत करना होगा। बच्चे भाषा का संस्कार पहले घर से ही सीखते हैं, फिर स्कूल में। जिस तरह से हमारा देश प्रगति कर रहा है, उसी प्रकार से हमें अपने संस्कार को आगे बढ़ाना। जो कि अपनी राष्ट्र भाषा में ही संभव हो सकता है। अब हम सबको मिलकर इस पर विचार करना पड़ेगा, सोचना पड़ेगा कि राष्ट्र उन्नति और भाषा की उन्नति कैसे संभव है, इसमें रोजगार परक शिक्षा और रोजगार की संभावना कैसे तलाशना है। वो दिन दूर नहीं जब हम जल्द ही अपने उद्देश्य में सफल होंगे और हिंदी को संपूर्ण राष्ट्र की भाषा बनाने में सफल होंगे।
हिंदी की समृद्धि के लिए जन-जन को जोड़ना है
हिंदी-भाषा में लेखन और उच्चारण की शुचिता पर विशेष बल देते हुए शब्द प्रयोग के तहत कई वर्षों से कार्य कर रहे शिक्षक-साहित्यकार घनश्याम अवस्थी जो अपनी कविताओं में हिंदी भाषा की समृद्धि के लिए सतत प्रयासरत हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जो पूरे देश को सूत्रबद्ध कर सकती है।
आज हिंदी की दशा अच्छी नहीं है। इसके क्या कारण हैं। हमें गंभीरता से निदान की ओर बढ़ना होगा। हिंदी भाषा की समृद्धि के लिए जन-जन में भाषा-शुचिता के लिए सतत प्रयास करने होंगे। देश में हिंदी के प्रख्यात भाषाविदों को एक मंच पर लाकर हिंदी के मानकीकरण के अधूरे कार्य को पूर्ण करने जैसी पहल करनी होगी। प्रचार-प्रसार के उचित उपाय अपनाने होंगे। यथार्थ के धरातल पर चलकर ही हम हिंदी भाषा को देश की राजभाषा का सम्मान दे सकते हैं।
मातृभाषा हिंदी की बात निराली है...
बीते 25 वर्षों से शिक्षिका व साहित्यकार डॉ. वाटिका कवंल हिंदी के लिए संघर्ष कर रहीं हैं। आकाशवाणी लखनऊ के घर आंगन कार्यक्रम में वार्ता करने के साथ ही हिंदी से उन्हें नए मुकाम हासिल हुए हैं। उन्होंने लोकगीतों में स्वाधीनता संग्राम का चित्रण, मइया चलो दियना बारि, लोकगीतों में पर्यावरण, गावै बैरिनियां फाग री, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, गंगा मइया तोहरे दर्सन से जियरा जुड़ाय, झूला धीरे से झुलाओ आदि लिखे हैं।
गीत का प्रसारण दूरदर्शन पर हो चुका है और दूरदर्शन के लिए वर्तमान में ‘लोकगीतों में आभूषण’ शीर्षक से संवाद लिख रही हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी हमें पहचान दिलाती है और विचारों को सशक्त बनाती है। ऐसे में हर किसी को हिंदी भाषा से लगाव हो और गंभीरता से हिंदी को जानें, तभी विकास संभव है। बिना हिंदी के देश की उन्नति संभव नहीं है। भारतेंदु ने भी लिखा है- बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय को सूल बिन निज भाषा वाटिका है, सून-सून लागे सब भाषा राजे फिरहूं घर खाली-खाली है जौने देस होत निज भाषा कै वर्षा ऊ मातृभाषा हिंदी कै बात ही निराली है।
हिंदी से मिला मुकाम, कर रहे हिंदी का गुणगान
शिक्षाविद और साहित्यकार रघुनाथ पांडे को हिंदी से कई ऊंचाइयां मिली हैं और हिंदी से लोगों को जागरूक कर रहे हैं। उन्होंने पंकिल पुलिन पर : कविता-संग्रह, खरी पांखुरी : मुक्तक संग्रह, नवा पन्ना : डायरी, मधुपर्क : पत्र-साहित्य समेत कई शोध आदि लिखे हैं। उन्हें साहित्य-भूषण-2018, साहित्य श्री-2018 मेरठ, साहित्योत्सव-2018 : साहित्य अकादमी भोपाल से सम्मान हालिस हो चुका है।
उन्होंने कहा कि हिंदी से ही उन्हें मुकाम मिला है। कहा कि राजभाषा हिंदी का सम्यक ज्ञान देश के सभी नागरिकों को होना चाहिए। इसकी शुरुआत हम अपने स्कूलों से ही कर सकते हैं ताकि देश के भावी नागरिक अपनी मातृभाषा से भलीभांति परिचित हो सके। सुझाव भी दिया कि हिंदी विषय पर स्कूलों में प्रतियोगिताएं कराई जाएं और वह लगातार अपने स्कूल में आयोजन भी करते हैं। जिसके सार्थक परिणाम सामने आए हैं।
अंग्रेजी मीडियम से की पढ़ाई, हिंदी में खास रुचि
कटरा बाजार के जूनियर हाईस्कूल की शिक्षिका अंकिता मिश्रा का हिंदी से लगाव ऐसा हैं कि वह अंग्रेजी मीडियम से पढ़ने के बाद भी करीब पचास लघु कहानियां लिख चुकी हैं, जो कि मुख्य रूप से महिलाओं और बच्चों पर आधारित हैं।
उन्हें हिंदी से कई स्तर पर सम्मान भी मिल चुका है। वह लगातार एक कहानियां लिख रही हैं। निरंतर हिंदी से किसी न किसी रूप में हमेशा जुड़ी रहती हैं और विभिन्न प्रकार से उसे आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करती हैं। बेसिक विभाग में नौकरी करते हुए यहां समय और अपने बच्चों की स्थिति को देखते हुए हिंदी से सभी को समृद्ध बनाने का प्रयास कर रही हैं। स्वामी विवेकानंद की शिक्षा, मिथिला की सीता, सियालकोट की गाथा जैसी किताबों से बच्चों को जोड़ती हैं।