हिंदी दिवस पर विशेष: - वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सूर्यपाल सिंह, शिवाकांत विद्रोही व सतीश आर्य हो चुके हैं सम्मानित
संवाद न्यूज एजेंसी
गोंडा। जिले के सैकड़ों रचनाकार गद्य और पद्य की प्रमुख विधाओं में लिखकर समाज में राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति चेतना जगा रहे हैं। यहां महाऋषि पतंजलि से लेकर गोस्वामी तुलसीदास व बाबा बोधिदास से लेकर अदम गोंडवी तक का दबदबा कायम रहा।
लगभग पांच दशकों से डॉ. सूर्यपाल सिंह, शिवाकांत मिश्र ‘विद्रोही’ व सतीश आर्य ने अलग-अलग विधाओं में साहित्य रचकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। इन तीनों यशस्वी साहित्यकारों को जहां विभिन्न संगठनों से सम्मान मिला है तो वहीं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से भी प्रतिष्ठित साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
लाखों पाठकों के चहेते हैं सूर्यपाल
साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकारों में सबसे प्रतिष्ठित नाम 86 वर्षीय डाॅ. सूर्यपाल सिंह का है। वर्ष 1975 में नाटक ''''परतों के बीच'''' से साहित्य जगत में पैठ बनाने वाले डाॅ. सूर्यपाल की नाटक, कहानी, उपन्यास, निबंध, आलोचना, कविता व शोध के क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी समस्त कृतियां ग्रंथावली शृंखला के दस भागों में संकलित हैं। ''''गीत गाने दो मुझे'''', ''''कंचनमृग'''' और ''''शाकुनपांखी'''' उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। दो लाख लोगों ने पीडीएफ डाउनलोड कर उनकी कृतियों का आस्वादन किया है। वर्ष 2018 में उन्हें प्रदेश सरकार ने साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है।
विद्रोही ने नवगीत में राष्ट्रीय स्तर पर बनाई पहचान
वर्ष 2020 में ‘साहित्य भूषण’ पुरस्कार से सम्मानित शिवाकांत मिश्र ‘विद्रोही’ की गणना ऐसे साहित्यकारों में की जाती है जिन्हें काव्य मंचों और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपार लोकप्रियता मिली है। नवगीत विधा में लिखने वाले विद्रोही पांच दशक से साहित्य साधना कर रहे हैं। उनके गीत संग्रह ‘किसलय कलश’, ‘सुगंध के हस्ताक्षर’ व खंडकाव्य ‘वीरभद्र’ व नवगीत संग्रह ‘रोटी है तो दाल नहीं है’ प्रकाशित हो चुके हैं। कुंभ मेला, लखनऊ महोत्सव व लाल किले पर नामचीन कवियों के साथ काव्य पाठ का गौरव भी उन्हें प्राप्त है।
अवधी साहित्य के गौरव हैं सतीश आर्य
कविता को कोकिल स्वर देने वाले साहित्य भूषण से सम्मानित सुकवि सतीश आर्य ने अपनी रचनाओं में गांव, गरीब, दलित व असहाय की पीड़ा पूरी संवेदना के साथ व्यक्त की है। पीपल, बरगद, वन, ताल व पोखर को नायक भी बनाया है। इनकी कई कविताएं पाठ्यक्रम का हिस्सा भी बन चुकी हैं। आर्य के काव्य संग्रह ‘महुआ वृक्ष तले’, ‘दोऊ आंखिन पुतरी भई हिंदी’, ‘छंद के छांव’ व ‘महुआरी’ प्रकाशित हो चुके हैं। साहित्य सेवा के लिए उन्हें विक्रमशिला विद्यापीठ भागलपुर से डॉक्टरेट की मानद उपाधि भी मिली है।