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रोटी की जंग लड़ रहा गोंडा किंग का परिवार

Fri, 14 Aug 2015 10:40 PM IST
गोंडा/अमर उजाला ब्यूरो
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जिले के धानेपुर थाना क्षेत्र श्रीनगर (बाबागंज) निवासी गंगा प्रसाद उर्फ गंगू बारी का नाम जिले के इतिहास में अमर हैं। छोटे खेतिहर प्रमोद बारी के घर में जन्मे गंगा प्रसाद बारी ने 13 साल की उम्र में गोरखपुर में आए महात्मा गांधी काव्याख्यान सुना जिसका उनके जीवन पर गहरा असरा पड़ा।
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इन्होंने कानपुर जाकर विक्टोरिया मिल में नौकरी कर ली और यहीं से इनका राजनीतिक जीवन शुरू हो गया। 1932 में छह माह की कैद व 20 रुपया जुर्माना, 1941 मे व्यक्तिगत सत्याग्रह में दस माह का कारावास व दस रुपये का जुर्माना लगा।

कौड़िया स्टेशन पर भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान नार लगाने के दौरान 942 में एक साल का कारावास तथा 50 रुपये का जुर्माना लगा। जगन्नाथ पुरी में तिरंगा फहराने के  लिए छह माह का कारावास हुआ। यह गांधी जी के साथ तीन माह में साबरमती आश्रम में भी रहे।
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विदेशी वस्त्र बहिष्कार, लगान बंदी आदि आंदोलनों के दौरान इनके योगदान देखते हुए जवाहर नेहरू ने गोंडा नरेश की उपाधि दी थी। यही नहीं एक बार जब सुभाष चंद्र बोस जब गोंडा आए तो उन्होंने इन्हें गोंडा किंग कहकर संबोधित किया और हाथ मिलाया।

आजादी मिली तो इस सेनानी की बलिदान गाथा भारत के इतिहास में अमिट होकर दर्ज हो गई लेकिन परिवार को कुछ नहीं मिला। इनके दो पुत्र सुकई व बरसाती थे। बरसाती की पत्नी माया आज भी पान की दुकान चलाती है जबकि पौत्र राजकुमार, अशोक, दिलीप सब्जी आदि का ठेला लगाते हैं।

पैतृक संपत्ति के रूप में दो बीघा जमीन थी जिससे खाने भर का अनाज भी नहीं मिल पाता था। पुत्रवधू माया देवी कहते हैं कि उनके ससुर जिन सेनानियों की रहनुमाई करते थे, उनके परिवारीजन पेंशन से लेकर नौकरी तक की तमाम सुविधाएं ले रहे हैं लेकिन उनके परिवार को कुछ नहीं मिला। काफी भागदौड़ की लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। 
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