गोंडा के पसका सूकरखेत में फूस की कुटिया बनाते कल्पवासी। -संवाद
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परसपुर (गोंडा)। भगवान वाराह की अवतार स्थली पसका सूकरखेत में कल्पवासी साधु-संत व गृहस्थों ने पहुंचकर घास-फूस की कुटिया बनानी शुरू कर दी है। इससे क्षेत्र भी गुलजार होने लगा है। मान्यता है कि साधु-संत कल्पवास, तपस्या में लीन रह कर अपना नाता सीधे परमेश्वर से जोड़ते हैं।
साधु-संत ब्रह्ममुहूर्त में सुबह उठकर सरयू में स्नान-ध्यान कर दिनचर्या शुरू करते हैं। मेले का मुख्य स्नान पर्व पौष पूर्णिमा 6 जनवरी 23 को पड़ रहा है। मेले का आयोजन होगा। साधु-संतों ने बताया कि धार्मिक स्थली पर वे लोग कई वर्षों से कल्पवास को आ रहे हैं। अवध धाम की चौरासी कोसी परिक्रमा परिधि में पसका सूकरखेत का अपना एक प्रमुख स्थान है।
परिक्रमा शुभारंभ होने पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। लोग त्रिमुहानी घाट पर स्नान कर भगवान वाराह देव मंदिर, गोस्वामी तुलसीदास जी की जन्मभूमि तथा उनके गुरुभूमि का दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं।
भगवान विष्णु ने लिया था अवतार
पौराणिक कथाओं के अनुसार मान्यता है कि इस पवित्र स्थान पर भगवान विष्णु ने वाराह का रूप धारण कर हिरण्याक्ष नामक राक्षस का वध कर पृथ्वी को मुक्त कराया था। इस स्थली को सूकरखेत के नाम से जाना जाता है। यहां भगवान वाराह देव का एक मंदिर बना है। जहां साल के बारहों मास श्रद्धालु पूजा-पाठ किया करते हैं।
संगम के अस्तित्व पर संकट
पसका, सूकरखेत में सरयू व घाघरा दो पवित्र नदियों का संगम हुआ था। इस लिए यह पवित्र स्थली संगम मेला के नाम से भी विख्यात है। सरयू-घाघरा के संगम स्थल त्रिमुहानी घाट पर श्रद्धालु स्नान करते हैं। लेकिन संगम स्थल पर बांध बनने से अब यहां संगम नहीं हो पा रहा है। अब यह संगम यहां से सात किमी. दूर चंदापुर किटौली में होता है।